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Monday, December 20, 2004

मेहमान का चिट्ठाः नितिन

नुक्ताचीनी ने मेज़बानी की तीसरी अनुगूँज की, और विषय ऐसा था जिस पर एक अंग्रेज़ी ब्लॉगर लगातार लिखते रहे हैं, "द एकार्न" के रचनाकार, सिंगापुर में बसे, नितिन पई। पेशे से दूरसंचार इंजीनियर नितिन एक प्रखर व मौलिक चिट्ठाकार हैं। अपने चिट्ठे में वे दक्षिण‍ एशियाई राजनैतिक और आर्थिक परिदृश्य पर खरी खरी लिखतें हैं, इस्लामिक व एटमी ताकत़ वाले राष्टृ खासतौर पर पाकिस्तान पर इनकी पैनी नज़र रहती है। मेरी गुज़ारिश पर नितिन ने अनुगूँज में शिरकत की जिसके लिए उनका धन्यवाद!

Akshargram Anugunjजिहादी आतंक ने जम्मू-कश्मीर राज्य की आर्थिक व्यवस्ता को गम्भीर हानि पहुँचायी है। पर्यटन और ग्रामोद्योग इस राज्य के प्रमुख व्यव्साय रहे हैं, लेकिन आतंकवादियों ने इन्हीं व्यवसायों को खास रूप से अपना निशाना बनाया है। कारण साफ है - आम जनता की उम्मीद जब तब बुझी रहे तब तक आतंकवादी दलों में शामिल होनेवालों कि कमी नही रहेगी। आतंकवाद के बीते दस-बारह सालों ने दो पीढ़ीयों की शिक्षा चौपट की है, जिसके कारण राज्य के आर्थिक सुधार की राहों में काफी मुश्किलें पैदा हो गयीं है।

इस समस्या का पूरा हल आसान नही है। सरकार की आर्थिक मदद तो ज़रूरी है ही पर आतंक का पूर्ण रूप से रुकना उस से भी ज़्यादा ज़रूरी है। यह दक्षिण अफ़्रीका की 'सत्य और समाधान#' समिति ने कर दिखाया है। अगर आम आतंकवादी अपनी हिंसा को पूरी तरह से त्याग कर अपने किये अपराधों को मान ले तो सरकार उन्हें माफ़ कर सकती है। इसके बाद पहला कदम है समाज में उनकी वापसी और दूसरा कदम, आर्थिक अनुकलन।

#नितिन मानते हैं कि कश्मीर समस्या का हल दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के अपराधियों के साथ न्यायोचित व्यवहार के लिए स्थापित सत्य और समाधान कमीशन की तर्ज पर किया जा सकता है।

Sunday, December 19, 2004

आतंक से मुख्यधारा की राह क्या हो?

Akshargram Anugunj: Third Eventपुर्नवास का प्रश्न केवल हथियार डाल चुके आतंकवादियों के लिए ही नहीं वरन् समाज के पूर्वाग्रहों के शिकार अनेक वर्गों के परिप्रेक्ष्य में प्रासंगिक है, चाहे वो परित्यक्त या व्यभिचार से पीड़ित महिलाएँ हों, किन्नर, अपंग, सजा भुगत चुके अपराधी हों, या एड्स जैसी कलंकित बीमारियों के पीड़ित। इन्हें मुख्यधारा में शामिल करने, अपने साथ समाज में उठने बैठने देने के विचार मात्र से ही हमारे पूर्वाग्रह हमें सिहरा देते हैं। हमें इनमें निहित कथित बुराईयों से संक्रमण का डर सताता है जबकि हममें से कई ऐसे हैं जो स्वभावगत रूप किसी न किसी समय व्यभिचारी, अपंग या किन्नर बन जाते हैं पर समाज के हंटर से बचे रहते हैं।

आतंकवाद का मसला वैसे भी बड़ा संवदनशील मुद्दा है, सरकार के लिए जो आतंकवादी है वो किसी वर्ग के लिए आज़ादी के सिपाही हो सकते हैं। राज्यों के विलय की पटेल नीति की कमी या हो या राजनयिक स्तर पर भारत का अंर्तराष्ट्रीय मंचों पर कमज़ोर प्रर्दशन या राजनेताओं के स्वार्थ का समर, कश्मीर का स्वर्ग सेना के हवाले करके समाधान की राहें तो बरसों पहले ही बंद कर दी गईं। भारत में सेना का इस्तेमाल भी बड़ा हास्यास्पद है, किसी भी राज्य के पुलिस और प्रशासनिक ढांचा इतना बलहीन है कि अपने माद्दे पर किसी भी आपदा से निबटने की कुव्वत नहीं, ज़रा भी परेशानी में फंसे नहीं कि केन्द्र से सेना भेजने का अनुरोध करने में पलक झपकने की भी देर नहीं लगती। आतंकवाद जैसे मसलों पर सेना के निबटने का तरीका ज़रा अलाहदा ही रहता है, इनके लिए दिल से ज्यादा दिमाग से लिए निर्णय ज़्यादा मायने रखते हैं। ऐसे में गेहूँ के साथ घुन का पिस जाना कोई अस्वाभाविक बात नहीं जिन्हें मानवाधिकार संगठन ज़्यादतियाँ कह कर पुकारती रही हैं।

मेरे विचार से सुबह के भूलों का विस्थापन ज़रूरी है क्योंकि यह आतंक के साये तले रह रही जनता में विश्वास जगाता है। कशमीर के लिए खास "पैकेज" राजनैतिक रूप से भी हमारा पक्ष दुनिया के सामने पेश कर सकते हैं। पर इन सभी से ज़रूरी है समस्या के निदान की ओर तेज राजनयिक कदमों की। यहीं गाड़ी बरसों से अटकी पड़ी है। हर बार दोनों तरफ के नौकरशाह कुछ न कुछ मसला उठा कर मुँह फुला कर बैठ जाते हैं। देशभक्ति ठीक है पर हमें यह सत्य भी स्वीकारना चाहिए कि कश्मीर की २२२२३६ वर्ग की.मी. ज़मीन में से पाकिस्तान लगभग ३५फीसदी (७८००० कि.मी) पर काबिज़ है। १९६३ के एक विवादास्पद समझौते के आधार पर पाकिस्तान लगभग ५१८० कि.मी. ज़मीन चीन के सुपुर्द कर चुका है। हमारे देश के अलावा सारी दुनिया में भारत के नक्शे में से पाकिस्तान के कब्ज़े वाली ज़मीन निकाल कर दिखाई जाती है। इस परोक्ष युद्ध में हम करोड़ो की रकम ओर बहुमूल्य जानें झोंक चुके हैं। मैं नहीं कहता ये कोई तुरत फुरत हल हो जाने वाला मसला है, पर हल की ओर कुछ कदम तो बढ़ें। बरसों से हम राजनीतिक स्टेलमेट के शिकार हैं।

छोटे मुँह बड़ी बात, पर रास्ते तो कई दिखते हैं, पहलाः पाकिस्तान को मटियामेट करने का ईरादा बना कर उस पर हमला बोल दें, परमाणु शक्तियों के बीच का यह युद्ध दुनिया और हमें किस मुक़ाम तक ले जाएगा इसकी भविष्यवाणी तो नेस्त्रादम भी शायद ही कर पायें। इसमें ग़र विजयी भी हुए तो टूटी आर्थिक कमर पर विश्व भर में पाकिस्तान के खैख्वाहों, जिसमें दुनिया का दरोगा भी शुमार है, की लात सहते हुए हम कभी उबर पायेंगे इस बात पर शंका होती है। एक और रूखः चीन से ज़मीन वापस ले कर वर्तमान नियंत्रण रेखा को सीमा रेखा का दर्जा दें दे, सबसे व्यावहारिक हल, या तीसराः संयुक्त राष्टृ को सर्वौच्च और निष्पक्ष मान कर (दुनिया के दरोगा के रहते इस बात पर यकीन करना ज़रा मुश्किल ही है) उसके और अन्य तटस्थ देशों की निगरानी में जनमत संग्रह हो, पर पूर्ण कश्मीर के लिए, भारत पाकिस्तान और चीन की ज़मीन मिला कर। अगर फैसला हमारी तरफ हो तो निगरानी रखने वाले देशों, संगठनों से लिखित गारंटी लें की पाकिस्तान आतंक के प्रायोजन से तौबा करे या सैंन्कशन्स झेल कर आर्थिक रूप से मिट जाने को तैयार रहे। भारत के पत्रकारों की हाल की पाकिस्तान यात्रा से सपष्ट है कि पाकिस्तान के कब्ज़े वाला आज़ाद कश्मीर भी कोई आज़ाद नहीं है। जे.के.एल.एफ जैसे संगठन न पाकिस्तान के साथ जाना चाहते हैं न भारत के,कश्मीर के ज्याद़ातर बाशिंदे आतंक से मुक्ति और खुशहाली वापस चाहते हैं, पाकिस्तान से उनका कोई मोह नहीं।

अब यह तो एक दिवास्वप्न ही होगा कि हम यह मानें कि कश्मीर की समस्या तो सुलझती रहेगी, पूर्व आतंकियों को पुर्नस्थापन का लॉलीपॉप देने भर से आतंक का वीभत्स खेल स्वतः ही बंद हो जाएगा। सीमा पार आतंक से समस्या उपजी, पर इसे बंद कराने के लिए वैश्विक जनमत बनाने तक में हमारा राजनैतिक नेतृत्व नाकामयाब रहा है। सारा मामला राजनयिक बयानबाज़ी के पाश में फँस गया है। राजनीतिज्ञ पाकिस्तान के खिलाफ एक ओर तो ज़हर उगल कर लोगों को बरगलाते रहें और दूसरी ओर रेल, बस मार्ग खोलने और क्रिकेट खेलने के दोगले कदम भी उठाते रहें। दुर्भाग्य की बात है कि रीढ़ विहीन राजनैतिक पाटो के बीच में पिसना ही इस राज्य की नियती बन चुकी है। कोई ऐसा नेतृत्व नहीं जो ये ठान ले की हल एक निर्धारित समय सीमा में निकालना ही है। नतीजतन, कैंसर का ईलाज़ नीम हकीम कर रहे हैं और रोग बढ़ा जा रहा है। डर कि बात यह है कि कहीं सही इलाज के अभाव में यह कैंसर कश्मीर को ही निगल न ले।

Saturday, December 11, 2004

भारतीय ब्लॉग मेला: ३७वां संस्करण

भारतीय ब्लॉग मेला में आपका स्वागत है। प्रकाशन में देरी के लिए क्षमा चाहता हूँ और बिना लाग लपेट शुरु करता हूँ यह आयोजन:

  • अतुल सी.एन.एन की एक ख़बर, जिसमें अमेरिकी पयर्टकों को युरोप में परेशानी से बचाने वाले कैनेडियन प्रतीक चिन्हों वाले लिबासों के प्रचलन का ज़िक्र था, का हवाला देते हुए पर्यटन के पहलुओं पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी कर रहे हैं।
  • साइकिल सवार साधनहीन बुढऊ की पीक के छींटों से व्यथित अनूप ने ठीकरा थूककर चाटने के हमारे राष्ट्रीय चरित्र पर फोड़ डाला
    कुछ विद्वानों का मत है कि 'थूककर चाटना' वैज्ञानिक प्रगति का परिचायक है। नैतिकता और चरित्र जैसी संक्रामक बीमारियों के डर से लोग थूककर चाटने से डरते थे। अब वैज्ञानिक प्रगति के कारण इन संक्रामक बीमारियों पर काबू पाना संभव हो गया है।
  • हिंदी के कदम बढ़ते हुए आ पहुँचे मोज़िला फ़ायरफ़ाक्स 1.0 ब्राउज़र और ई-मेल क्लाएंट मोजिला थंडरबर्ड के हिन्दी संस्करण तक, बता रहे हैं रवि
  • नीलेश अपने चिट्ठे में बात कर रहे हैं, कैप्चास के विषय में जिनकी मदद से आप अपने ब्लॉग कि टिप्पणीयों में शरीर के अंग के विशालिकरण के तरीकों और वियाग्रा कि दुकानों कि फेहरिस्त से बच सकते हैं। हालाँकि वे बताते हैं
    स्पैमर्स ने कैप्चास की भी तोड़ निकाल ली है। किसी ने ऐसे सॉफ्टवेयर रोबो का ईजाद किया है जो किसी पंजीकरण फॉर्म में कैप्चा परीक्षण से पाला पड़ते ही उसे किसी पोर्न जालस्थल पर प्रेषित कर देगा जहाँ आगंतुकों को कहा जाएगा कि और पोर्नोग्राफी देखनी है तो इस टेस्ट को पास किजीए। उनके दिए जवाब का रोबो इस्तेमाल करेगा ईमेल पंजीकरण फॉर्म पर।
  • विजय ठाकुर ने प्रस्तुत की बाबा नागार्जुन की मैथिली कविता का हिन्दी रुपांतर, हालाँकि अनुवाद ज़रा क्लिष्ट हो गया है।
  • जितेन्द्र शर्मा सूडान में तेल और जातियता से उपजी दोगली घरेलू और अंर्तराष्ट्रीय राजनीति के घालमेल और वहाँ जारी संघर्ष से आम जनता की तकलीफों का ज़िक्र कर रहे हैं अपने चिट्ठे में। एक अन्य चिट्ठे में वे सामाजिक और आर्थिक संकट के पाटों के बीच फंसे नाईजीरिया के राष्ट्रपति के विदेश यात्राओं पर हो रही चर्चाओं के दोनों पहलू पेश कर रहे हैं।
  • अंततः आशीष का चिट्ठा जहाँ वे यातायात की एक ख़बर का भारतीय परिप्रेक्ष्य में ज़िक्र कहते हुए कहते हैं कि पूर्वनिर्धारित यातायात के नियमों को सीखना भर काफी नहीं है क्योंकि समय और परिस्थिति के अनुसार बदलाव न होने के कारण इनका कारगर होना मुश्किल है।

माफी चाहता हूँ, कुछ नामित चिट्ठे व्यक्तिगत थे जो मेले के नियमानुसार शामिल नहीं किए जा सके। सभी प्रतिभागियों का शुक्रिया। धन्यवाद शांति का भी मुझे आतिथ्य का मौका देने के लिए। अगले मेले के मेज़बान हैं याज़ाद

हिन्दी ब्लॉगरोल

मुझे याद आता है कि जितेन्द्र ने संभवतः सबसे पहले यह कहा था कि ब्लॉग जगत से सुर्खियों की तरह वे हिन्दी ब्लॉगरोल जैसा भी कुछ चाहते हैं। मंतव्य यह था कि हर चिट्ठाकार और उनके पाठकों को नए चिट्ठों का पता उसी ब्लॉग से मिल जाए और हर बार टेम्प्लेट से छेड़छाड़ की माथापच्ची भी खत्म हो। तो पेश है हिन्दी ब्लॉगरोल स्क्रिप्ट इस्तेमाल का तरीका वही, बस निम्न HTML अपने ब्लॉग टेम्प्लेट पर चस्पा कर लें।

<script language="javascript" src="http://www.myjavaserver.com/~hindi/BlogRoll.jsp" type="text/javascript"></script>

नमूना मेरे ब्लॉग पर ही मौजूद है। आप से एक मदद की गुजारिश है, किसी नए हिन्दी चिट्ठे का पता चलते ही मुझे या चिट्ठाकार ग्रुप पर जरूर इतल्ला कर दें जिससे यह सूची ताज़ी रहे। आपकी सूचना से न केवल यह बल्कि डीमॉज़ निर्देशिका, हिन्दी चिट्ठाकार वेबरिंग, ब्लॉगडिग्गर की फीड (उस पर निर्भर चिट्ठा विश्व) और चिट्ठाकार ग्रुप्स सभी का भला होगा।

Saturday, December 04, 2004

भारतीय ब्लॉग मेला: आमंत्रण

हर्ष का विषय है कि भारतीय ब्लॉग मेला पहली बार किसी अन्य भाषा के चिट्ठे पर अवतरित हो रहा है।Bharteeya Blog Mela 37th Edition यह नाम भी बड़ा उपयुक्त है, हालाँकि कंक्रीट के जंगलों में मेले अब होते नहीं पर मेले का नाम ज़ेहन में आते ही मनोरंजन ध्यान आता है, एक ऐसा आयोजन जहाँ विभिन्न विषयों पर लिखने वाले, मुख़्तलिफ़ पेशे और अलाहदा परिवेश से जुड़े चिट्ठाकारों कि तरह ही विविधता होती है, गोया कि हर किसी के लिए कुछ न कुछ होता है।

तो मित्रों, ३७वें भारतीय ब्लॉग मेले में नुक्ताचीनी के आतिथ्य में आपकी प्रविष्टियाँ आमंत्रित हैं। प्रविष्टियाँ दिसंबर ३ से १०, २००४ के बीच लिखे चिट्ठों पर आधारित हों। अपनी प्रविष्टि मुझे debashish at gmail dot com ईमेल कर सकते हैं, बेहतर हो इसी चिट्ठे की टिप्पणी (कॉमेंट) के रूप में प्रेषित कर दें। प्रविष्टि भेजने की अंतिम तिथि है दिसंबर १०, २००४.

शेष शर्तें हमेशा जैसी ही :

  • चिट्ठे भारतीयों द्वारा भारतीय विषयों पर लिखे गए हों।
  • कृपया चिट्ठे की स्थाई कड़ी (पर्मालिंक) भेजें। स्थाई कड़ी के अभाव में चिट्ठे का नाम तथा तिथि का ज़िक्र करें।
  • आप अपने या/तथा दूसरों के चिट्ठे प्रस्तावित कर सकते हैं।
  • चिट्ठे व्यक्तिगत न हों।

संबंधित कड़ियाँ :

Friday, November 05, 2004

कादम्बिनी में नुक्ता चीनी का ज़िक्र


आपने पूछाः कैसा लगता है? ज़ाहिर हैः अच्छा लगता है

Sunday, October 31, 2004

देह पर टिकी संस्कृति

अक्षरग्राम अनुगूँज - पहला आयोजन

एक नज़र मायानगरी मुम्बई के एक अखबार कि सुर्खियों पर। सिनेमा के इश्तहार वाले पृष्ट पर मल्लिका अपने आधे उरोज़ और अधोवस्त्र की नुमाईश कर अपनी नई फिल्म का बुलावा दे रही हैं। पृष्ट पर ऐसे दर्जनों विज्ञापन हैं, औरत मर्द के रिश्तों को नए चश्मे से देखा जा रहा है। पेज ३ पर अधेड़ और जवां प्रतिष्टित हस्तियों के मदहोश, अधनंगे चित्रों के साथ उनकी निजी ज़िन्दगी पर कानाफुसी है। मुखपृष्ट पर खबर है अमेरिकी हाई स्कूलों में डेटिंग कि जगह "हुक अप" (रात गई बात गई) ने ले ली है। भीतर के एक पृष्ट पर डॉ .मोजो एक २३ वर्षीय पाठिका की परेशानी का समाधान दे रहे हैं जो कि अपने प्रेमी के "लघु आकार" से व्यथित हैं। वर्गीकृत विज्ञापन के हेल्थ वर्ग में अनोखे मसाज़ पार्लर के इश्तहार मसाज़ से ज्यादा वर्णन मसाज़ करने वाली/वाले लोगों का ज़िक्र कर रहा है। एक अन्य लेख में चित्रमय चर्चा का विषय है कि औरतों को पुरुषों के नितंब क्यों पसंद आते हैं। प्रितिश नंदी अपने स्तंभ में किसी सर्वे का हवाला देते हुए लिखते हैं कि संसार में समलैंगिक पुरुषों की संख्या सामान्य पुरुषों कि तुलना में कहीं ज्यादा हो गई है (कहीं इसलिए तो मुम्बई महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं मानी जाती)। मुम्बई के एक पुर्व मेयर अपने साक्षात्कार में एतराज़ जता रहे हैं बिंदास होती जा रहीं लड़कियों के आचरण पर। एक दूसरे साक्षात्कार में हेमा मालिनी आश्चर्य जता रही हैं कि आजकल लड़कियां रोल पाने के लिए किसी भी हद तक जा रही हैं (दीगर बात है कि उन्होंने शायद ईशा देओल की फिल्म धूम नहीं देखी)। बाहर देखता हूँ कि कुछ स्कूली बच्चियाँ परिपक्व कपड़ों में ध्यानाकर्षण प्रस्ताव पारित करने में लगी हैं। पड़ोस के मनचले लड़के अपनी "मीन मशीन" का हार्न बजाते हुए पड़ोस से निकलते हैं और बच्चियाँ खिलखिला उठती हैं। वे देह की परीक्षा में पास हो गई हैं शायद। उधर बाग के हर कोने में कईजोड़े प्रेम का सार्वजनिक प्रदर्शन के अपने जवां होने का प्रमाण दे रहे हैं, भले ही अधिकांश प्रेमियों की अभी मूँछे भी नहीं आई हों। ज़ाहिर है जब उनके बिज़ी माता पिता सुबह ४ बजे पार्टी से टुन्न लौटेगे तो उनके पास होन्डा सिटी कि पिछली सीट पर लिखी उनके सुपुत्र की रात कि दांस्तां टटोलने का बल ना होगा। कुल मिलाकर युवाओं ने इस नए रसायन शास्त्र की प्रायोगिक परीक्षा में अव्वल आने कि ठान रखी है।

इतिहास गवाह रहा है बदलावों का। जैसे जैसे वक्त की बयार की गति और रुख बदलते हैं वैसे ही मानवीय संवेनाओं की रेत कहीं और जाकर नया आकार पाती है। कभी पैसा, कभी मानवीय कमजोरियाँ, कभी धर्म तो कभी अधर्म, कभी राजनैतिक तो कभी सांस्कृतिक बदलाव के झोंके, कई कारक मिलकर गढ़ते हैं संवेदनाओं का रुप। बदलाव के जिस बयार की बात कर रहा हूँ वह शायद माया की चलाईहुई है। तभी संभवतः ज़िक्र माया नगरी का आया। मैं आज के भूटान के बारे में नहीं जानता पर मुझे याद है कि भूटान नरेश के एक काफी पुराने साक्षात्कार में व्यक्त किए उनके विचार, कि कैसे सैटेलाईट चैनलों के प्रसारण पर बाँध लगाकर उन्होंने अपने छोटे से देश की संस्कृति को बचाकर रखा। हमारे देश में प्रगतिशीलता के मापदंड पर सेंसरशिप को अभिशाप माना जाता है, अनुपम खेर को केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से बाहर करवाने वालों की एक बड़ी शिकायत यह भी थी कि इनके राज में सर्वाधिक "ए" फिल्में जारी हुईं (इसमें भला क्या शक है कि "मर्डर" सपरिवार देखने लायक फिल्म थी) तिस पर उन्होंने टीवी पर भी लगाम कसने की बात कही।

अक्षरग्राम अनुगूँज - पहला आयोजनमुझे यह बात बड़ी हास्यास्पद लगती है कि राजनैतिक संप्रभुता पर गर्व करने वाले हम भारतीय अपनी सांस्कृतिक संप्रभुता कि रत्ती भर भी परवाह नहीं करते। शायद इसलिए कि इस देश ने फ्रांस की तरह कभी कोई सांस्कृतिक आन्दोलन ही नहीं देखा। जिस सांस्कृतिक संप्रभुता को बचाने के लिए भूटान जैसे छोटे मुल्क कदम उठाने में नहीं झिझकते उसे हमने मुक्त बाजार और वैश्विक अर्थव्यवस्था के नाम पर सरेआम नीलाम कर दिया। २०० साल अंग्रेजों की गुलामी करने के बाद अब हम उनके सांस्कृतिक गुलाम बन गए हैं।

दुनिया बदली है, मानता हूँ, पर हमारे मनोरंजन के मायने बदले मुक्त बाजार और केबल टीवी ने, सोप से रियेलिटी टीवी से आज के उत्तेजक रीमीक्स तक अब हमारा कुछ नहीं रहा। जिस क्रिकेट के हम दिवाने हैं वह भी हमारा खेल नहीं है। आप शायद ये कहें कि क्या यह उच्चश्रृंखलता, उन्मुक्ततता ७०-‍८० के दशक में नहीं थी? भारत का कौन सा ऐसा शहर है जहाँ "सिरॉको" न दिखाई गयी हो, कौन सा इलाका जहाँ का केबल वाला भक्त प्रह्लाद की सीडी नहीं रखता। सही मानना है आपका पर कम से कम जो भी होता था वो होता था परदे के अंदर। गटर को खुला रखोगे तो सड़ाँघ फैलेगी ही।

बहरहाल मायानगरी से जो संदेश बाहर जा रहे हैं वो देश के हर कोने को दूषित कर रहे हैं। इस माया के पीछे माया नगरी के कौन लोग हैं नहीं जानता। पर यही ताकतें, जो मानती हैं कि देह ही सब कुछ है और सेक्स हर हाल में बिकता है, देश कि सांस्कृतिक राजधानी में बैठकर यह तय कर रही हैं कि देश के मनोरंजन के पैमाने कैसे होंगे। पर मेरे दोस्त, मुम्बई और दिल्ली भारत नहीं है, हुक्मरानो के पास दूरदर्शिता न सही कॉमन सेंस तो हो। वरना एक TB-6 चैनल बैन करने से क्या होगा हल्के डोज़ देने वाले हज़ारों वैकल्पिक TB-6 खरपतवार की तरह फैल रहे हैं।

Wednesday, August 25, 2004

वर्ज़न वरण बनाम ईंटरएक्टिव माध्यम

बजाज अपनी एक वाहन श्रेणी के लिए बने टीवी विञापन में रेडियो सम्राट अमीन सायानी की आवाज़ का प्रयोग कर रहा है। दरअसल यह एक ही विञापन है पर इसका प्रर्दशन अदनान सामी के साथिया फ़िल्म के लिए गाए एक चर्चित गीत के प्रारंभिक हिन्दी अंतरे के बाद अन्य भाषाई अंतरों के पृथक कॉम्बीनेशन के रूप में किया जाता है। नतीजतन, एक ही विञापन के कई संस्करण बन गए हैं। एक अन्य वाहन के विञापन में चालक पेट्रोल पंप पर आकर "पेट्रोल" का ही नाम भूल जाता है। वहाँ का मुलाज़िम उसके कई सवाल बूझने के बाद सही शब्द सुझा पाता है। इस विञापन के भी कई संस्करण दिखाए जाते हैं, कई दफा एक ही कार्यक्रम के व्यावसायिक ब्रेक्स के दौरान।

हालांकि जिस उद्योग से मैं जुड़ा हूँ वहाँ उत्पाद के अलाहदा संस्करण होना एक ज़रूरी कवायद है (और इन संस्करणों के देखरेख के लिए भी अन्य सॉफ्टवेयर उत्पादों की जरूरत पड़ती है), पर विञापन जगत के लिए शायद यह नई बात है। विञापन का मेमरी रिटेन्शन यानी की जेहन में ताज़ा रहना उसकी सफलता के मुख्य आधारों में से एक माना जाता रहा है। मुझे याद है कि विको वज्रदंती का जो विञापन छोटे व बड़े पर्दे पर दिखाया जाता रहा है उसकी संरचना व जिंगल गीत में कोई आज तक कोई भारी बदलाव नहीं किया गया, उत्पाद के निर्माताओं की विञापनों की स्थाई छवि पर इतना भरोसा रहा है। संभव है कि यह तगड़े व्यापारिक आधार वाले उत्पादों पर ही लागू होता हो क्योंकि जिस क्षेत्र में मुक़ाबला तगड़ा है, जैसे कि शीतल पेय जैसे उत्पाद, वहाँ विञापन हर छमाही पर नए और बड़े सितारे के साथ बदल कर पेश होते रहे हैं। अब तक भाषाई आधार पर ज़रूर एक ही ईश्तहार के कई रूप होते रहे हैं, जैसे पेप्सी के जिस उत्पाद का उत्तर भारत में अक्षय कुमार प्रचार करते हैं, उसी विञापन का दक्षिण भारतीय संस्करण उनके स्थान पर चिरंजीवी का सहारा लेता है। हाँ, विञापन का मसौदा वही होता है।

सिनेमा जगत में तो एक ही कहानी पर लोग फिल्म के वृहद संस्करण बना कर ही पेट पालते रहे हैं। बॉक्स आफिस और स्थिति की मांग हो तो पटकथा में बदलाव कोई बड़ी बात नहीं होती। पटकथा लेखक का मूल कथानक धरा का धरा रह जाता है और कहानी पर बाजार के मुद्दे भारी पड़ जाते हैं। कहते हैं कि अमिताभ की अस्पताल से सकुशल वापसी के बाद मनमोहन देसाई ने मूल पटकथा का रुख मोड़ कर कुली फिल्म में अमिताभ के किरदार को क्लाईमेक्स में मौत को धता बताते दिखाया। मणिरत्नम की फिल्मों के भी भाषाई संस्करण बनते रहे हैं। ८० के उत्तरार्ध में गुलशन कुमार ने कॉपीराईट कानून की तहों में छेद खोज कर पुराने मशहूर गीतों के रचनाकारों के अधिकारों की खिल्ली उड़ाते हुए वर्ज़न गीतों का प्रचलन शुरु किया, यह प्रथा अब अधनंगे विडियो वाले रीमिक्स गानों तक पहुँच गयी है।

विषय पर वापस आना चाहूँ तो मेरे कहने का पर्याय है कि किसी कथानक के अलाहदा अंत वाले संस्करण यदा-कदा ही देखने को मिलते हैं। कुछ समय पहले मैंने ऐसी एक अंग़्रेज़ी फ़िल्म जरूर देखी थी (रन लोला रन) जिसमें एक ही घटना अलग परिस्थितियों में घटती है और कथानक हर बार किसी अलग मुक़ाम पर पहूँचता है। ज़ी टीवी पर भी एक ऐसा परीक्षण किया गया था, कार्यक्रम "आप जो बोले हाँ तो हाँ, आप जो बोले ना तो ना" के द्वारा, जिसमें दर्शकों की राय के आधार पर कहानी मोड़ लेती थी। कल्पना कीजिए कि आपकी स्थानीय वीडियो लाईब्रेरी में "एक दूजे के लिए" फिल्म का मूल और सुखांत संस्करण दोनों मुहैया हों। सुना है कि रामगोपाल वर्मा भी एक ऐसी फिल्म पर कार्यरत हैं जिसकी कहानी के दो अलग तरह के अंत होंगे। अभी ये मालूम नहीं कि ऐसे संस्करण एक ही सिनेमा हॉल में प्रदर्शित होंगे या प्रांत और भाषा के अनुसार, पर ईंटरएक्टिव टीवी और सिनेमा के जरिए निःसंदेह है कुछ नया करने की दिशा में यह सराहनीय व रचनात्मक कदम हैं।

Thursday, July 22, 2004

चिट्ठा विश्व का नया संस्करण

हिन्दी चिट्ठों के संसार की अनंतर दास्तां प्रस्तुत करने के प्रयास में कुछ सुधार के बाद, चिट्ठा विश्व नए रुप में प्रस्तुत है, जिसमें चिट्ठाकार व चिट्ठा परिचय के स्तंभ जोड़े गए हैं। पद्मजा और नीरव का धन्यवाद करना चाहुँगा जिन्होने इस कार्य में योगदान दिया है। जनभागीदारी की अपेक्षा रखते हुए आपका भी सहयोग चाहता हूँ। अपनी राय से मुझे अवगत करावेंगे तो खुशी होगी। चिट्ठाकारों के परिचय के लिए मैं व्यक्तिगत रूप से चिट्ठाकारों को लिख रहा हूँ, पर कई दफा ईमेल पता उपलब्ध न होने के कारण हो सकता है सभी को न लिख पाऊं, इस लेख को आमंत्रण मान कर आप मुझे चिट्ठा विश्व पर मौजूद विधि द्वारा संपर्क कर सकते हैं। यदि आप किसी हिन्दी चिट्ठे की समीक्षा करना चाहें तो उत्तम, कुछ और विषय पर सार गर्भित लेख लिखना चाहें तो संकोच न करें। चौपाल में चर्चा करना चाहें तो अक्षरग्राम तो है ही।

Monday, July 05, 2004

दौड़ बदलाव की

यदि मेरे यूँ नाक भौं सिकोड़ने से आप मुझे सहिष्णुता जैसा प्राचीन (और जिसे विलुप्त भी माना जा सकता है) न मान लें तो आज के युवा वर्ग पर मुझे कई मामलों में विस्मय और नाराज़गी की मिश्रित अनुभूति होती है। लड़के स्त्रियों की भांति मशरूम केश सज्जा के कामिल हैं, कानों में "बिंदास" बालियां पहनते हैं, तो कन्याएँ मय टीशर्टॆ व पतलून अपना पुरुषत्व दिखाने की होड़ में हैं। बिंदी हिन्दी की ही तरह पिछड़े लोगों की पहचान मानी जाने लगी है, साड़ी तो दूर की बात है सलवार कमीज़ से भी "बहनजी" कहलाए जाने का खतरा रहता है। अपने ब्वॉय फ्रेंड के साथ मोटरसाईकल पर चिपककर बैठकर, पीछे से उठी टीशर्टॆ बार बार नीचे खिंचते हुए ये कन्याएं शो-बिज़नेस से प्रभावित हैं। चमड़ी की व्यापारी मल्लिका शेरावत इनकी पथ प्रर्दशक हैं। पैसे और शोहरत की रेस लगी है, हर कोई किसी "टेलेन्ट हंट" में जीतकर रातोंरात बुलन्दियों को छूना चाहता है। इसके लिए "कुछ भी" करने को तैयार हैं, शादीशुदा अपनी पहचान छुपाकर, घर से भागकर सफलता की गाड़ी में सवार होना चाहते हैं।

समाचार पत्रो पर नज़र डालें, कुछ साल पहले तक परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाओं के जांचते समय परीक्षक को चिरौरी भरे कुछ ऐसे नौट मिलते थे,"सर, दिन भर घर के काम में जुटे रहना पड़ता है, तीन महीने बाद मेरी शादी है, मुझे प्लीज पास कर देवें", आजकल की भाषा काफी बदल गयी है, अब पास होने के एवज़ में ये बालाएँ "कुछ भी" करने को तैयार हैं। ये "ब्यूटिफुल" समाज वैसे केबल टीवी के आने से "बोल्ड" हो ही गया था, रही सही कसर इंटरनेट ने पुरी कर दी है। यहां तो सेंसर का भी जोर नहीं चलता। आकर्षण तो पहले भी होता था अब इज़हार के तरीके बदल गए हैं, युगल एक साथ बंद केबिन में सूचना हाईवे पर प्रेम के मायने तलाशते हैं, एक माह पहले और प्रशासन की मार पड़ने तक मेरे शहर के इंटरनेट कैफे उनकी हर ख्वाहिश पूरी कर देते थे, पुलिसिया खोज ने कई स्थानों पर एटैच्ड शयनकक्ष भी खोज निकाले। सरकार करोड़ों खर्च कर जिन संचार माध्यमों पर "संयम से सुरक्षा" की मुनादी कर रही है, उन्हें तो केबल वाले डंडे के जोर से भी दिखाने को राजी नहीं, तो यह पीढ़ी संयम सीखे कैसे? भारत में सर्वाधिक संख्या युवाओं की है और एड्स के रोगियों की सबसे ज्यादा तादात भी यहीं है। नवीन और पुरातन की हाथापाई तो हर युग में जारी रहती है, पर बदलाव के इस दौर का मुख्य जरिया शरीर बन गया है। ये प्रक्रिया क्या गुल खिलाएगी, क्या जाने?

Sunday, June 27, 2004

अटल व्यथा

भाजपा एक्सप्रेस भारत प्लैटफॉर्म पर लगी और उसकी रवानगी भी हो गई। इन सारे वर्षों में और हालिया घटनाक्रम से यह बात कभी भी पल्ले नहीं पड़ी कि आखिर वाजपेयी को गले लगाए रखने की भाजपाई मजबूरी क्या है। वैंकैया ने सीधे कह दिया कि व्यक्ति आधारित राजनीति अब नहीं होगी, मोदी बने रहेंगे, फिर अगले ही पल वाजपेयी की मनौव्वल में जुट गए। दरअसल सोनिया के नाम पर व्यक्तिवाद का विरोध कर अपने बाल नोंचने वाले भाजपाई स्वयं पीछे रहते तो आज पार्टी कार्यकर्ताओं की रज़ामंदी के खिलाफ जाकर उमा भारती और वसुंधरा राजे की ताज़पोशी न हो पाती। सारे वाकये पर कविह्रदयी पूर्व प्रधानमंत्री (जिन्होनें "थाली का बैंगन" मुहावरे को पहले भी चरितार्थ किया है) ने कराह कर कहा "बस और नहीं" पर फिर पहले का कहा मज़ाक में टाल गए। इधर भाजपा का भावी चरित्र कैसा होगा यह तय कर पाना उतना ही दुष्कर होता जा रहा है जितना कि पुर्वानुमान लगाना कि इस साल मॉनसून कैसा रहेगा।

बहरहाल जैसा कि मेरा पुर्वानुमान था, वाजपेयी जी का युग और भाजपा की उदार छवि दोनों ही भूतकाल की बातें हो जाने वाली हैं। पत्रकार कमलेश्रर ने सही कहा है, "वाजपेयी का सैधान्तिक निर्गम हो चुका है"। ऐसे में उग्र हिंदू छवि वाले नेताओं के तो वारे न्यारे होंगे पर कमोबेश तटस्थ छवि वाली जमात का क्या होगा, राम जाने! संघ पहले ही कह चुका है कि "चीते का दाग छोड़ देना" भूल थी। इसलिए "तिल गुड़" फैक्टर को तिलांजली दे कर राम फिर याद आने लगे हैं। मुझे डर है कि अपने दाग वापस पाने की फिराक़ में यह घायल चीता कहीं आदमखोर न हो जाए।

Friday, May 21, 2004

हिन्दी ब्लॉग‍ गीत

याज़ाद ने अनिल के एक चिट्ठे के हवाले से हिन्दी ब्लॉग‍ गीत की बात छेड़ी। तो अपन कहां पीछे रहने वाले थे। हाजिर है कुछ ब्लॉग गीतः

ये अपने बाप्पी दा इश्टाईल में:

ब्लॉगिंग बिना चैन कहां रेSSS
कॉमेन्टिंग बिना चैन कहां रेSSS
सोना नहीं चांदी नहीं, ब्लॉग तो मिला
अरे ब्लॉगिंग कर लेSSS

..ये कुछ अल्ताफ राजा की शैली:

तुम तो ठहरे बलॉगवाले
साथ क्या निभाओगे।
सुबह पहले मौके पे
नेट पे बैठ जाओगे।
तुम तो ठहरे बलॉगवाले
साथ क्या निभाओगे।

और ये जॉनी वॉकर का बयानः

जब सर पे ख्याल मंडराएं,
और बिल्कुल रहा ना जाए।
आजा प्यारे ब्लॉग के द्वारे,
काहे घबराए? काहे घबराए?

सुन सुन सुन, अरे बाबा सुन
इस ब्लॉगिंग के बड़े बड़े गुन
हर बलॉगर बन गया है पंडित
गूगल भी थर्राए।
काहे घबराए? काहे घबराए?

एकाध पैरोडी आप की ओर से क्यों न हो जाए?

Monday, May 17, 2004

खिसियानी बिल्ली...

सुषमा सवराज मय पतिदेव राज्य सभा से पलायन करना चाहती हैं। वे भाजपा के राजनीति के WWF में एक विदेशी से पटखनी खाने के बाद से बेचैनी महसूस कर रहीं थी। अंबिका सोनी ने चुटकी ली, "अरे परवाह कौन करता है, वैसे भी श्रीमान स्वराज के मेम्बरशिप के दो ही महीने बचे हैं।" दरअसल सारी नाराजगी वाजपेयी से है। सुषमा और उमा भारती जैसे कर्मठ (कट्टर पढ़ें) भाजपाई संघ की तरह ये मानते हैं भाजपा के हिंदूवादी तेवर नरम करने से ही बेड़ा गर्क हुआ। वाजपेयी का राजनीतिक सन्यास तो तय ही है, विहिप और तोगड़िया भी किसी भी एक्स वाई जेड को उनकी जगह देने के लिए राजी हैं जो हिन्दुवादी संगठनों को राजयोग की भस्मी चटा सकने की कुव्व्त रखता हो। हाशिए पर पड़े गोविंदाचार्य सोनिया विरोघ के पुरोधा बनकर मिस भारती का दिल जीतना चाहते होंगे शायद। सुषमा और उमा को मलाल ये भी है कि सोनिया के विदेशी मूल के सार्थक मुद्दे को पर्याप्त तूल न दे कर और महाजन की कंप्यूटरी पंडिताई के चक्कर में पड़कर ही भाजपा की चुनाव में मिट्टी पलीद हुई, तिस पर मुरली जैसे नेता को सर चढ़ाया गया जिनकी जमानत भी न बच सकी। पार्टी के भीतर जब इतने उहापोह हों और सबसे फिट नेता के लिए डार्विनी सरवाईवल का संग्राम चल रहा हो तो खिसिया जाना कौन सी बड़ी बात है!

Wednesday, May 12, 2004

पुरस्कार पखवाड़ा

बड़ा अच्छा पखवाड़ा रहा। यूं तो पहले भी कुछ ऐसे ईनामात मिले पर इस बार काफी दिनों बाद किस्मत ने साथ दिया लगता है। पहले तो प्राप्त हुआ भाषाईंडिया की ओर से माईक्रोसॉफ्ट वायरलेस कीबोर्ड और माउस (कहना पड़ेगा कि बहुत ही शानदार चीज है, हालांकि नामुराद कुरियर वालों ने ४ बैटरियां रास्ते में ही पार कर दीं) उनकी एक प्रतियोगिता में भाग लेने पर और दूसरा जेएफसी स्विंग्स पर एक पुस्तक जावारैन्च पर। उम्मीद की जाए कि ऐसे और भी मौके आयेंगे!

Monday, May 10, 2004

नए ब्लॉगर पर नुक्ता चीनी

नए ब्लॉगर के सलोने रूप की तारीफ तो मैं कर ही चुका हूँ, मुफ्त सेवा वालों को अनेक नई सुविधाओं जैसे टिप्पणी ‍(जो हेलोस्कैन के कारण मेरे तो किसी काम की नहीं), नए आकर्षक खाके, चिटठाकार के प्रोफाइल (जो ब्लॉगर समूह को सुदृढ करेंगे), नए टैग (मुझे पसंद आया, हाल के चिटठों वाला जिसके लिए मैंने अपना पकवान बना रखा था), चिट्ठे लिखने के लिए मैं या तो WBloggar का प्रयोग करता था या ब्लॉग दिस पैनल का तो इ‍पत्र से चिट्ठे प्रेषण की सुविधा फिलहाल तो मेरे काम की नहीं। एक नवेली चीज जो जँची वो है, पोस्ट पेज, सेटिंग > इनेबल पोस्ट पेजेस पर जाकर यदि आप इसे चालू कर देंगे तो आपकी स्थाई कड़ियां उस चिट्ठे को एक अलग पृष्ट पर दिखायेगी। चिटठे के प्रिव्यू की व्यवस्था भी लाजवाब है।

जो खलने वाली चीज है वो है चिट्ठे संपादित करते समय कैलेंडर द्वारा उनकी खोज की सुविधा का हटाना और पब्लिश करने में समय ज्यादा लगना। पर जैसा कि कहते हैं, दान की गाय के दांत नहीं गिना करते ;)

Sunday, May 09, 2004

सम्पूर्ण कायापलट

आज ब्लॉगर ने हैरत में डाल दिया। उनका डैशबोर्ड न केवल काम का है बल्कि बेहद हसीन भी है। इसके अलावा सम्पूर्ण कायापलट कर दिया है ब्लॉगर ने अपने रुप में। शायद थोड़ा सा ध्यान सरलीकरण की ओर दिया गया है। क्या आपने देखा?

Friday, April 30, 2004

बात भूख की

डेनियल ने एक अनोखे वाकये का उल्लेख किया है जब भिखारियों ने दान किया जा रहा खाना यह कह कर ठुकरा दिया कि यह खाना गर्मियों के लिए उपयुक्त नहीं है। कारण जो भी हो, डेनियल का यह कहना काफी सही है कि दान के सहारे जीवनयापन करने वाले अब इससे इतने इतराए हुए हैं कि अब भीख भी उन्हें मन मुताबिक चाहिए। जैसा डेनियल ने कहा, ये लोग भूखे नहीं वरन आलसी और लालची लोग हैं।

मेरे कार्यस्थल पर आते और लौटते समय मुझे बरसों से एक उम्रदराज पर खासा हट्टा कट्टा भिखारी दिखता है। उसके एक हाथ में कुष्ठ रोग का कुछ असर है। अगर मैं और वह एक जैसी वेष भूषा में साथ खड़े हो जावें तो मैं शर्तिया कह सकता हूँ कि कमजोर काया के आधार पर भीख मुझे ही मिलेगी। बहरहाल यह जनाब बोलते कुछ नहीं, बस बाजू में आकर हाथ जोड़कर खड़े हो जाएँगे आपको निहारते रहेंगे। शुरूआत मे मैंने कुछ पैसे दिये भी। पर हर रोज आप उसी व्यक्ति को कैसे जरूरतमंद मान सकते हैं। इस देश में दिक्कत यह है कि कुष्ट जैसे रोग, शारीरिक अयोग्यता के आधार लोग आपसे इतनी हिकारत से पेश आते हैं कि आप मुख्यधारा में आकर अपनी रोजी रोटी कमा नहीं सकते, छोटे शहरों में परिवार में खुशी के मौकों पर और मुम्बई जैसे शहर में जब किन्नर जबरिया पैसे मांगते हैं तो मन में कई बार ये ख्याल आता है कि वाकई ये लोग इस तरह पेट ना भरें तो समाज कौन सा इन्हें कोई रोजगार मुहैया करा देगा।

वक्त के साथ ये मजबूरी आदत बन जाती है। भीख मांगना पेशा और अधिकार बन जाता है। सरकारी वितरण प्रणाली में इतने छेद हैं कि सारा अनाज चूहे और अफसर खा जाते हैं, सस्ता अनाज गरीब और जरुरतमंदों तक पहुँचता नहीं। भूखे की भूख बनी रहती है, टैक्स चोरी से पनपते धनाढ्य दान दे कर फील गुड करते हैं।

Tuesday, April 27, 2004

हालिया चिटठों की कड़ियां

अगर आपने गौर किया हो तो इस चिट्ठे में दाँयीं ओर "हाल के चिट्ठे" दिखते हैं, दरअसल ये जावास्क्रिप्ट इस चिट्ठे के एटम फीड को पार्स करके बनायी गई है। अगर आप अपने ब्लॉग पर इसका उपयोग करना चाहते हैं तो निम्नलिखित कोड यथास्थान पर पेस्ट कर दें। ब्लॉगर.कॉम वाले तो इसका सीधा प्रयोग कर सकते हैं अन्य <$BlogSiteFeedUrl$> के स्थान पर अपने एटम फीड का URL दें। ध्यान रहे, यह एटम फीड पर ही काम करेगा, RSS या RDF फीड पर नहीं।

<script language="javascript" type="text/javascript" src="http://www.myjavaserver.com/~javaman/RecentPosts.jsp?feed=<$BlogSiteFeedUrl$>"></script>

यह आधारित है ब्लॉगस्ट्रीट के RSS पैनल पर, पर ब्लॉगस्ट्रीट एटम का प्रारूप अभी नहीं समझता है। यदि आप 2RSS जैसी सेवा का प्रयोग कर अपने एटम फीड को RSS में परिवर्तित भी कर दें तब भी ब्लॉगस्ट्रीट इसे दर्शा नहीं पाता है। यदि आपको ऐसी किसी मुफ्त सेवा का पता हो तो अवश्य बतायें।

नए पड़ाव

खुशी की बात है कि हिन्दी ब्लॉग के काफिले में नए राही जुड़ते जा रहे हैं। नवागंतुक वैभव पाण्डेय का स्वागत है। इस बीच नजर पड़ी ब्लॉगडिग्गर पर। जानकर अच्छा लगा कि यह कोई साधारण एग्रीगेटर नहीं वरन आपको चिट्ठों का समूह बनाने में भी मदद करता है। ऐसा समूह बनाने का एक लाभ यह हो सकता है कि एक जैसे चिट्ठे एक जगह जमा हो और उनके नवीनतम चिट्ठों के संक्षिप्त रुप एक ही पृष्ठ पर मिल जावें और सोने पर सुहागा हो अगर उनका एक ही संयुक्त आर.एस.एस फीड हो।

अतः देर न करते हुए मैंने हिन्दी चिट्ठों का एक समुह बना ही डाला। इस समुह का फीड URL है http://www.blogdigger.com/groups/rss.jsp?id=130 और सम्मिलित चिट्ठों की सूची ओ.पी.एम.एल प्रारूप में भी यहाँ उपलब्ध है। फिलहाल समूह के मुखपृष्ठ पर चिट्ठों के नाम सही तरीके से दिख नहीं रहे, मेरे ख्याल से अभी इस सेवा में सुधार की काफी गुंजाईश है। चुंकि यह अभी बीटा में ही है इसलिए थोड़ा और इंतजार करना चाहिए। वैसे ब्लॉगलाईन्स पर समूह की फीड बढिया दिख रही थी। उम्मीद की जाए कि मैं और ब्लॉगडिग्गर दोनों ही इन्हें ताजातरीन रख पायेंगे।

Wednesday, April 21, 2004

काव्यालय ~ इस सफ़र में

मैंने कवि बनने की अपनी नाकाम कोशिशों का ज़िक्र इस चिट्ठे पर कभी किया था। उन दिनों गज़ल लिखने पर भी अपने राम ने हाथ हाजमाया, बाकायदा तखल्लुस रखते थे साहब, बेबाक। तो उन्ही दिनों की एक गज़ल यहां पेश है। अगर उर्दु के प्रयोग में कोई ख़ता हुई हो तो मुआफी चाहुँगा।

इस सफ़र में बहार के निशां न मिले
जहाँ गई भी नज़र, सूखे से दरख्त मिले।

मेरी ख़ता कि अब बूढ़ा बीमार हूँ मैं
शर्म आती है उन्हें सो अकेले में मिले।

रहनुमा1 कहतें हैं तोड़ेंगे वो पुराने रिवाज़
हमें तो सब मुबतला2 अक़ीदों3 में मिले।

हैरां हूँ क्या हो जाती है मुहब्बत ऐसे
गोया दो चार दफ़ा हम जो बग़ीचों में मिले।

मिल्क़यत लिख वो गुज़रे जो 'बेबाक' के नाम
हमदम बनने को रक़ीब4 रज़ामंद मिले।


1. रहनुमा = राह दिखाने वाला (Guide)
2. मुबतला = जकड़े हुए (Embroiled In)
3. अक़ीदा = मत (Doctrine Of Faith)
4. रक़ीब = दुश्मन (Enemy)

Sunday, April 18, 2004

रहिमन माया संतन की..

उज्जैन में सिंहस्थ की खबरों में बड़ा अजीब विरोधाभास नजर आता है। भई, बचपन से हम को तो यही सिखाया-बताया गया है कि साधु वैराग का दूसरा नाम होते हैं; मोह-माया, मानवीय कमजोरियों, वर्जनाओं से परे, गुणीजन होते हैं। हो सकता है कि कलियुग की माया हो, वरना मुझे तो ऐसे कुछ संकेत दिखे नहीं। खबरों पर सरसरी नजर दौड़ाएँ तो पता चलेगा कि फलां साधु करोड़ों का चैक भुनाने बैंक पहुँचे, एक आगजनी में साधुओं के टेंट में लाखों के नौट सुलगते देखे गये, आगजनी से क्षुब्ध साधुओं ने कलेक्टर पर कीचड़ उछाल दी और अधिकारियों से हाथापाई की।

कुल मिलाकर मुझे तो सर्वत्र यही दिखता है कि इस सर्वधर्म समभाव वाले देश में, जहाँ कहने को तो राज्य का कोई मज़हब नहीं है (the state has no religion), धर्म के नाम पर आप समाज की माँ-भैन कर सकतें हैं, कोई माई का लाल चूँ-चपड़ नहीं कर सकता। अगर आप नंगे घूमें तो समाज पागल कह कर आप पर पत्थर बरसायेगा और ग़र आप एक नागा साधु हैं तो समाज की औरतें अपने पतियों की उपस्थिती में आपका पैर धो कर पियेंगी। ऊपर उल्लेखित अगर एक भी खबर सच्ची है तो मैं तो ये मानुंगा कि ये *ले साधु नहीं, निरे कपटी और ढोंगी हैं, सोने-चांदी के जेवर चमकाने के बहाने ठगी करने वाले लोगों से भी अधम हैं ये लोग। पर समाज है कि आंखे मूंदे पड़ा है। तोगड़िया बोलते हैं, "अटल जी हमारे मामले में न बोलें, अयोध्या हो जाने दीजीए फिर ३०,००० अन्य मस्जिदों की बारी है।" मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री ताल ठोंक कर कहतीं हैं, "हाँ, मैं संघ परिवार के साथ मिलकर सरकार चला रही हूँ।" उधर भाजपा कहती है मुसलमानों का पार्टी में विश्वास बढ़ता जा रहा है।

कैसा धर्म-निरपेक्ष राज्य है यह? रहीम आज होते तो जाने क्या सोचते!

Thursday, April 08, 2004

मेहमान का चिट्ठाः हेमन्त

बॉलीवुड और चोरी की प्रेरणा

विगत दिनों जब बार्बरा टेलर ने सहारा टीवी के धारावाहिक करिश्मा को कॉपीराईट उल्लंघन के आधार पर बंद करवाने की धमकी दी थी तो बॉलीवुड में सपने बुनने के कारखाने को तो जैसे साँप सूँघ गया था। हालाँकि बाद में बार्बरा मान‍ मनोव्वल से बस में कर ली गईं पर इस घटना से बॉलीवुड की कई हस्तियों की कई रातों ओर दिनों की नींद जरूर हराम हो गई होगी। इस घटनाक्रम से न केवल बॉलीवुड की चोरी की आदतों का भंडाफोड़ हुआ वरन् इससे दुसरी "आधार सामग्री" पर उनकी पूर्ण निर्भरता और हॉलीवुड से जुड़ी अदृश्य नाभिरज्जू का खुलासा हो गया। यह निंदनीय प्रवृत्ति बॉलीवुड में सर्वव्याप्त क्यों है? मेरा मानना है कि इसके बीज काफी पहले बो दिए गये थे।

बॉलीवुड का जन्म उसके नाम की तरह हॉलीवुड की कोख से हुआ है। उसकी शुरुआत चलचित्र और बोलती फिल्मों के अविष्कार के लगभग बाद ही हुई। उन दिनों यह आम बात थी कि निर्देशक या निर्माता या अभिनेता ‍(या सभी) अंग्रेज़ या अमरीकी हों। उस समय के कई विशिष्ट भारतीय निर्देशकों ने इस कला में महारत हासिल करने के लिए विदेश में प्रशिक्षण भी प्राप्त किया। (दादासाहेब फाल्के भी १९१० में बनी "द लाईफ आफ क्राईस्ट" से प्रेरित हुए थे जो उन्होंने बम्बई में देखी थी।) इससे पश्चिम का प्रभाव अवश्यम्भावी रूप से पड़ा। दरअसल हमने इस पश्चिमी प्रभाव से शुरुआती दौर में काफी कुछ सिखा है और आज जो भी हम हैं (कुछ क्षेत्रों में) उसका बहुत सा श्रेय इसको जाता है। दुर्भाग्यवश, भारत के लिये (आपके नजरिये पर निर्भर है) इन बाहरी तत्वों का दिया सहारा या नियंत्रण भारतीय सिनेमा की आत्मा में गहरा समा गया प्रतीत होता है।

राजकपूर सदृश शोमैन भी पीछे नहीं रहे। अपने चार्ली चैपलिन नुमा खानाबदोश किरदारों के द्वारा उन्होंने दर्शकों का दिल जीतने की ठान ली। यह काम कर गया, और वो अकेले नहीं थे। इस प्रारंभिक व्याख्या का हुबहू खाका प्रयोग कर दूसरे फिल्म निर्माताओं ने भी सफलता हासिल की। बॉलीवुड की स्थिती उसकी व्यथा है। बम्बई में होते हुए इस उद्योग को गैर व्यवसायिक तौर पर चलाया जा सकता है भला! जाहिर है, यहाँ चलचित्र को संचार के नहीं निवेश के माध्यम के रूप में देखा जाता है।

भारतीय दर्शक वर्ग दूसरों से काफी भिन्न है; बस उनका पैसा वसूल होना चाहिए। एक कठिन और थकानेवाले दिन के उपरांत उन्हें शुद्ध मनोरंजन चाहिए, सामाजिक समस्याओं पर कोई पाठ नहीं। नतीजन, भारतीय सिनेमा की मुख्यधारा जल्दी ही फार्मूला फिल्में बनाने तक सिमट गई। जो भी चलचित्र इस प्रथा को तोड़ता उसे "कला सिनेमा" करार दे कर बड़े शहरों और दूरदर्शन पर रविवार दोपहर के प्रसारण समय तक सीमित कर दिया जाता। हैरत की बात नहीं कि बॉलीवुड के फिल्मकारों की पुश्तें निर्माताओं के एक ही उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसके हाथ की कठपुतलियां बनती रही हैं, बॉक्स आफिस पर सफलता। "सड़क" से "जिस्म" तक, निर्देशकों को लगता है कि उनके पास "हिट" बनाने का सीधा जवाब मौजूद है। किसी सफल हॉलीवुड चलचित्र का हिन्दी पुर्ननिर्माण कर इक्का दुक्का जगह बदलाव कर दिया और तैयार हो गई एक "प्रेरित" पटकथा। क़ैद नाज़मी ने द वीक में अपने लेख बॉलीवुड कॉपीकैट्स में पटकथा लेखक की दुःखद दास्तान का ब्यौरा दिया है। कोई चलचित्र उद्योग जो अपने पटकथा लेखकों के साथ इतना बुरा बर्ताव करता हो वह भला स्वस्थ प्रवृत्ति या मौलिकता की डींग कैसे मार सकता है? पर ये भी मानना होगा कि सिनेमा निर्माण करने वाले हर देश ने हॉलीवुड के रद्दी फार्मुला का अनुसरण करने का प्रयास किया है। ऐसे में सिर्फ बॉलीवुड पर क्यों ऊँगली उठाई जाए?

इसके विपरीत कि भारत (और काफी हद तक बॉलीवुड) रिकॉर्ड संख्या में फिल्मों का निर्माण करता है, हमने हॉलीवुड (या विश्व सिनेमा) पर शायद ही कोई असर डाला होगा। नजर डालें १९६० की फ्रांसिसी नई लहर पर (जिसने हॉलीवुड के सिनेमा निर्माण में क्रांति ला दी) या इतालवी नवीन वास्तविकता वादी सिनेमा पर या जापानी कला-कौशल युक्त सिनेमा (स्टार वार्स कुरुसावा की समुराई चलचित्रों से प्रभावित हुआ था) अथवा चीन और हांगकांग के कुंग फू चलचित्र। बॉलीवुड ने क्या बदला है? कुछ नहीं। हमारे लिए यह एक‍ तरफा रास्ता रहा है।

अगरचे कोलकाता उच्च न्यायालय ने बार्बरा की अर्जी खारिज न कर कोई दृष्टांत पेश किया होता तो हो सकता है कि बॉलीवुड की नींद खुलती और सबक सीखा होता। उसके बिना बॉलीवुड बस इसी विश्वास पर आगे बढ़ता रहेगा कि हॉलीवुड तो है ही "प्रेरणा" प्राप्त करने के लिए।

हेमंत कुमारइस पखवाड़े के मेरे मेहमान हेमन्त कुमार फिल्मों के दीवाने हैं। यहाँ तक कि वे रिर्जवॉयर डॉग्स के पात्र एडी कि तरह "नाईस गाई" कहलाना पसंद करते हैं। मूलतः मद्रास निवासी हेमन्त भारतीय और हॉलीवुड पर पैनी नज़र रखते हैं और हर तिमाही अपना ब्लॉग टेम्पलेट जरूर बदलते हैं (मज़ाक कर रहा हुँ यार)। अपने मुख्य चिट्ठे के अलावा हेमन्त तमिल सिनेमा पर खास चर्चा अपने अन्य ब्लॉग टीकाड़ा में करते हैं।

Tuesday, April 06, 2004

बकाया बातें

फिर वही दौर जब चिट्ठे पढ़ता तो हूँ पर कुछ लिखने का जी नहीं करता। ऐसे में सोचा कुछ बकाया बातें कर ली जाएं। पहले हिन्दी के तकनीकी शब्दों के प्रयोग से संबंधित एक बात। शायद आप को ञात हो, की सूचना प्रोद्योगिकी से संबंधित शब्दों के अंग्रेज़ी से हिन्दी मान्य तजुर्मे यहां उपलब्ध है।

दूसरी बात अन्य भारतीय भाषाओं में चिट्ठों की, पिछले एक चिटठे में मैंने इसका ज़िक्र किया था कि बांगला में एक भी चिट्ठा नहीं दिखा। सुकन्या दी के सहयोग से मैंने इस दिशा में कुछ शुरुआत करने की सोची और जन्म हुआ प्रथम बांग्ला ब्लॉग का। मूलतः यह चेष्टा है बांग्ला भाषिओं को बांग्ला युनिकोड का प्रयोग कर अपना चिट्ठा प्रारंभ करने के लिए प्रेरणा देने की। सुकन्या दी ने स्वयं अपना बांग्ला ब्लॉग भी शुरु किया है और जाहिर है जरुरत एक बांग्ला ब्लॉग डायरेक्टरी की भी थी।

Monday, March 29, 2004

हम ब्लॉग

प्राकृत भाषा में ब्लॉग की बात करें तो निःसंदेह अगुआई का सेहरा तमिल भाषियों के सर बंधेगा। हिन्दी चिट्ठों के संसार में नई लहर उठे अभी शायद कुछ माह ही हुए हैं, आलोक ने भी तकरीबन १ साल पहले अपना हिन्दी चिट्ठा शुरु किया था, पर तमिल भाषा में कई चिट्ठाकारों ने मिलकर इस आंदोलन को वृहद बना दिया है। सही सही मालूम नहीं कि इनमें से कितने युनिकोड कूटलिखित हैं पर मेरे ख्याल से अधिकांश हैं। इधर मेरी मातृभाषा बांग्ला समेत बाकी सभी भारतीय भाषाओं में चिट्ठों का मेरा गूगल अन्वेशण निरर्थक ही रहा। यदि आप को जानकारी है तो अवश्य बताएँ।

ताज़ा खबर [17 अप्रेल]: एक मराठी ब्लॉग मिला है, मी माझा। और बांग्ला ब्लॉग के शुरुआती कदमों की आहट तो आपने अब तक सुन ही ली होगी।

Tuesday, March 23, 2004

बस आगे बढ़तें रहें

पंकज के मुवेबल टाइप के अनुवाद के दौरान हुई चर्चा में मैंने या विचार रखे थे कि log, trackback, preview, template, password, username, archives, flag, bookmarklet जैसे पारिभाषिक शब्दों को जस का तस लिखना चाहिए, हर शब्द का हिन्दीकरण उचित नहीं।

पंकज का मानना है:

मैं सोचता हूँ कि अनुवाद ऐसा होना चाहिए जो कि एक हिन्दी माध्यम से दसवी पास व्यक्ति भी समझ सके । यानि की अंग्रेजी उसने केवल छठी से दसवी तक पढ़ी हो। या फिर कोई सरकारी कार्यलय का बाबू भी समझ सके।

विनय ने कहा:

जैसे-जैसे नए लोग आएँगे और लिखेंगे, अपने आप एक सर्वमान्य और विस्तृत शब्दकोश बनता जाएगा। शुरुआती समस्याएँ तो जायज़ हैं।

पंकज और विनय, आप दोनों की बात में दम है कि तकनीकी शब्दावली सामान्य व्यक्ति कि समझ में बसने लायक होना चाहिए। जो दिक्कत मैं देख पाया वह यह है कि यदि हम बोलचाल की भाषा के प्रयोग की अघिक चेष्टा करें तो भाषा अशुद्घ होने का डर रहता है, क्योंकि बोलचाल में तो हम हिन्दी, खड़ी बोली, अंग्रेज़ी, उर्दु और स्थानीय बोली का सम्मिश्रण बोलते हैं। दूसरी ओर यदि भाषा की शुद्घता पर ष्यान केंद्रित करें तो शब्दावली अति क्लिष्ट हो कर जनसामान्य के पहुँच से दूर हो जाती है। शायद यही कारण है कि जहाँ Trackback के लिए "विपरीतपथ" जैसे शब्द मुझे अटपटे लगते हैं वही ऐसे शब्दों का तुरन्त कोई हिन्दी समानार्थी भी नहीं सूझ पड़ता। वहीं Blog के लिए "चिट्ठा" काफी जँचता है।

तो जैसा विनय ने कहा, समय लगेगा, विभिन्न लोग अलग‍-अलग शब्दावली रचेंगे और अंततः कोई सर्वमान्य शब्द ज़बान पर चढ़ जाएगा। आगे बढ़ते रहना जरूरी है और पंकज आपका ये कदम हिन्दी को आगे लाने में अवश्य ही मददगार साबित होगा और हम जैसो के लिए प्रेरणास्त्रोत भी।

Tuesday, March 09, 2004

मेहमान का चिट्ठाः नितिन

कश्मीर और पाकिस्तानी अंर्तविरोध

ज़िया-उल-हक़ के शासन मे इस्लाम को छोड कोई और विचारधारा नही बची।
मेरा यह मानना है कि जब तक पाकिस्तान अपने भारत-विरोध को छोड़ खुद अपनी राह पर नहीं चलता तब तक उप-महाद्वीप में पूर्ण शांति की आशा नहीं की जा सकती। 1947 के बाद चाहे-अनचाहे पाकिस्तान एक स्वतंत्र राष्टृ बन गया है, यह एक सत्य है। लेकिन स्वतंत्र पाकिस्तान की अपनी स्वतंत्र विचारधारा बनते-बनते रुक गयी। कुछ पाकिस्तानी बुद्धिजीवियों का मानना है कि “क़ैद-ए-आज़म” जिन्ना यह कभी नही चाहते थे कि वह देश एक इस्लामी राज्य बने – बल्कि वह भारत के मुसलमानों का अलग घरोंदा बने। लेकिन भारत के मुसलमानों ने ही नही बल्की सरहद के पठानों ने भी इस प्रतिक्रिया का तिरस्कार किया। परिणाम यह् है कि पाकिस्तान आज तक यह फैसला नहीं कर पाया कि उसका असली अस्तित्व क्या है! बांग्लादेश के जन्म के बाद् ज़िया-उल-हक़ के शासन मे इस्लाम को छोड कोई और विचारधारा नही बची।

७ मार्च के दैनिक “द न्यूज़” मे इकबाल मुस्तफा इसी विषय की चर्चा करते हुये कह्ते हैं-

अब समय आ गया है कि पाकिस्तान खुद अपनी तकदीर की तलाश करे।

इस तरह का लेख बहुत सालों मे पहली बार पढ़ने को मिला है। लेकिन जब तक पाकिस्तान का शासन सेना के हाथ मे है, परिवर्तन की उम्मीद बेकार है।

भारत पाकिस्तान के साथ कश्मीर के मुद्दे पर बातें और समझौता तो कर सकता है पर शायद पूर्ण रूप से सुरक्षित नही हो सकता।

इस पखवाड़े का "मेहमान का चिट्ठा" लिख रहे हैं, सिंगापुर में बसे नितिन पई। पेशे से दूरसंचार इंजीनियर नितिन एक प्रखर व मौलिक चिट्ठाकार हैं और उन मुठ्ठीभर भारतीय चिट्ठाकारों में शुमार हैं जो चिट्ठाकारी के लिए जेब ढीली करते हैं। अपने चिट्ठे "द एकार्न" में नितिन दक्षिण‍ एशियाई राजनैतिक और आर्थिक परिदृश्य पर खरी खरी लिखतें हैं, इस्लामिक व एटमी ताकत़ वाले राष्टृ खासतौर पर पाकिस्तान पर इनकी पैनी नज़र रहती है। मेरी गुजारिश पर नितिन ने कश्मीर समस्या और पाकिस्तान की भुमिका पर अपने विचार इस चिट्ठे में लिखे हैं। शुक्रिया नितिन

Monday, March 08, 2004

काव्यालयः बनकर याद मिलो

कॉलेज के दिनों में हर कोई कवि बन जाता है, कम से कम कवि जैसा महसूस तो करने लगता है। जगजीत के गज़लों के बोलों के मायने समझ आने लगते हैं और कुछ मेरे जैसे लोग अपनी डायरी में मनपसंद वाकये और पंक्तियाँ नोट करने लगते हैं। कल अपने उसी खजाने पर नज़र गयी तो सोचा क्यों ना कुछ यहाँ भी पेश किया जाए। "बनकर याद मिलो" मेरी कविता नहीं है, मुझे याद भी नहीं किस ने लिखी, पर मुझे उस वक्त बहुत पसंद आयी थी। यदि आप कवि का नाम जानतें हों तो अवश्य सूचित कीजिएगा।

बहुत दिनों से कहीं आँख भर
देखा नहीं तुम्हें,
सपनों में आ सको नहीं तो
बनकर याद मिलो।

दूरी तो तन की होती है
मन की क्या दूरी?
जो विचार के साथ चलें हैं,
कैसी मजबूरी?

बहुत दिनों से किसी विगत से
वह अनुबंध नहीं,
बड़ी घुटन है, साथ गंध के
दूर कहीं निकलो।
सपनों में आ सको नहीं तो
बनकर याद मिलो।

Friday, March 05, 2004

संचार माध्यम और सामाजिक दायित्व

भारतीय टेलिविज़न परिदृश्य के सन्दर्भ में बात करें तो आप को दो स्पष्ट समूह मिलेंगे। एक ओर तो सरकारी टेलिविज़न दूरदर्शन है और दूसरी तरफ उपग्रह चैनलों का झुण्ड। दोनों की कार्यप्रणालियों में खासा अंतर है। दूरदर्शन पारंपरिक तौर से सत्तारूढ़ दल का सरकारी भोंपू बना रहा है। अगर इस बात को नज़रअंदाज़ कर सकें तो पायेंगे कि दूरदर्शन स्पष्टतः ऐसे कार्यक्रमों का भी निर्माण भी करता रहा है, जिनकी उपग्रह चैनलों के कार्यक्रम निर्माताओं से कभी अपेक्षा नहीं की जा सकती। उदाहरण के लिए, क्या आप उम्मीद रख सकते हैं कि ज़ी टीवी या स्टार प्लस कभी "कृषि दर्शन" या "नृत्य का अखिल भारतीय कार्यक्रम" जैसे कार्यक्रम या गुमनाम वृत्तचित्रों का प्रसारण करेगा? मेरा ईशारा संचार माध्यमों के सामाजिक दायित्व की ओर है।

उपग्रह चैनलों की मजबूरी जगजाहिर है। टी.आर.पी और मुनाफा कमाने की होड़ में उनके पास सास‍ बहू, रोना धोना और बदन दिखाउ रीमिक्स विडिओ दिखाने के अलावा और चारा भी क्या है। उन्हें दूरदर्शन की तरह अनुदान की दक्षिणा थोड़े ही मिलती है। हालांकि प्रसार‍भारती के जन्म के बाद से दूरदर्शन को भी पैसे कमाने पड़ रहे हैं और उनके दृष्टिकोण के बदलाव को महसूस भी किया जा सकता है। कहाँ गए वो वृंदगान और टेलिनाटिकाएं! शुक्र है कुछ अच्छाई अभी भी शेष है।

जासूस विजय: जागरुकता मनोरंजन सेहालिया कार्यक्रमों में मुझे जासूस विजय बड़ा पसंद आया। एड्स और महिलाओं के प्रति सामाजिक रवैये के प्रति जागरूकता लाने के उद्देश्य से बी.बी.सी और नेको द्वारा निर्मित ये पुरस्कृत जासूसी धारावाहिक काफी मशहूर भी हो गया है। अभिनेता ओम पुरी इसमें सूत्रधार की भुमिका निभाते हैं। धारावाहिक मुलतः ग्रामीण दर्शक वर्ग के लिए है पर इसका कलेवर बड़ा रोचक है, दर्शकों को मौका दिया जाता है कि वो असली अपराधी की पहचान के ईनाम जीत सकें। जो चीज़ मुझे भाती है, वह है इस धारावाहिक में मनोरंजन तथा शिक्षा का सही मिश्रण। रोमांच और मसाले से भरपूर कहानी के द्वारा असल संदेश बेलाग स्थानीय भाषा में घर घर पहुंच रहा है। एक रोचक बात ये है कि इस कहानी के मुख्य किरदार यानि जासूस विजय, जिसे मंजे हुए कलाकार आदिल खंडकार हुसैन निभा रहे हैं, को भी एच.आई.वी ग्रस्त बताया गया है। जैसे जैसे कहानी आगे बड़ रही है और विजय का साथी किरदार गौरी के साथ प्यार पनपता दर्शाया जा रहा है एक बड़ा नाजुक सवाल भी खड़ा हो जाता है, क्या एक एच.आई.वी ग्रस्त व्यक्ति को विवाह का अधिकार मिलना चाहिए?

इस धारावाहिक को अनेक भारतीय भाषाओं में डब किया जाता है और ताजा खबर ये है कि अब इसे थाईलैंड तथा कंबोडिया में भी प्रसारित किया जाएगा। एक और अच्छा धारावाहिक एड्स पर जागरूकता लाने के लिए चल रहा है "हाथ से हाथ मिला" जिसमें दो बसों में युवा यात्री शहर और गाँव जा कर लोंगो को कॉन्डोम के इस्तमाल के प्रति जागरूक करते हैं। इन कार्यक्रमों के निर्माताओं को मेरी बधाई!

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इस चिट्ठे का अंग्रेज़ी रुपांतरण यहां उपलब्ध है।

Thursday, March 04, 2004

दोस्ती की रिश्वत

जिह्वा ने हसीब के एक हास्यास्पद लेख की चर्चा इस चिट्ठे में की है। हसीब का मानना है कि अगर कश्मीर जीतना है तो भारत को पाकिस्तान से आगामी क्रिकेट श्रृंखला हार जाना चाहिए। हैरत होती है कि कलमकार कागज पर कश्मीर जैसी समस्या का किस तेजी से हल निकाल लेते हैं। तरस भी आता है। लेखक की राय काफी हद तक भाजपा की चुनावी रणनीति से मेल खाती है। भाजपा का भी यही मानना है कि सुखद अर्थव्यवस्था का मंत्र पढ़कर और भारत‍ पाक दोस्ती की लॉलीपॉप पकड़ाकर जनता को बरगलाया जा सकता है। उन्हें ये लगता है कि भारत में बसे तमाम मुसलमानों का दिल पाकिस्तान में बसता है तो पाक से अच्छे संबंध बनाने का कटोरा हाथ में थामने पर अल्पसंख्यक वोट खुद‍ ब खुद झोली में आ गिरेंगे। जावेद अख्तर और अन्य जागरूक मुसलमान बुद्धीजीवियों ने हिंदुस्तान टाईम्स को लिखे एक पत्र में लिखा है:

शर्म कि बात है कि वाजपेयी और आडवाणी दोनों ये सोचते हैं कि भारत‍ पाक दोस्ती की रिश्वत देकर वे मुस्लिम वोट हासिल कर लेंगे।

बाहुबली बनने चले बुद्धिजीवी

सागरिका घोष मानती हैं कि भाजपा के मन में यह पेच रहा है कि वह बुद्धिजीवियों, कलाकारों और इतिहासकारों का दिल नहीं जीत पाई। सर विदिया को मंच पर ला कर वे इस बात को झुटलाना चाहतें हैं। कैसी विडंबना है कि जिस जमात के विचारों को छद्म धर्मनिरपेक्षतावाद या वामपंथी विचारधारा बता कर खारिज कर देते थे अब उन्हीं का साथ पा कर सम्मानित बनने की सोची जा रही है।

मैं ये मानता हूँ कि भाजपा ने बीते बरसों बड़े सलीकेवार तरीके से अपना जनाधार बनाया है। और बुद्धिजीवियों को अपने खेमे में लाने की कोशिश भी इसी दूरगामी रणनीति का हिस्सा है। राजनीतिक चूहों के हालिया पलायन के रुख से दिख भी रहा है कि अब भाजपा किसी के भी लिए अछुत नहीं रही। भाजपा के योजनाबद्ध तरीके के अब तक के परिणामों का विश्लेषण करें तो इस रणनीति का फल भी उन्हें इच्छानुसार मिला है। शिवसेना, बजरंग दल, दुर्गा वाहिनी, स्वयं सेवक संघ जैसे बाहुबलीय संगठनों का साथ है। केवल पैसा कमाने के लिए सत्ता चाहने वाले घटक दलों का समर्थन हासिल है। वाजपेयी जैसा श्रेष्ठ मुखौटा नेता पास है जिसको आगे कर गीदड़ को भेड़ बताया जा सके। और ऐसे कार्यकर्त्ता हैं जो नेपथ्य में पार्टी की असल विचारधारा के अनुसार एजेंडे को अमलीजामा पहना रहे हैं (मेरा यह चिट्ठा भी पढ़ें) इतिहास के पुर्नलेखन से लेकर तालिबानी हिन्दू संगठनों के हाथ मजबूत करने तक। अपने महान नेताओं के महिमामंडन से लेकर सांस्कृतिक पुलिसिया भुमिका निभाने तक। यानि जो असल एजेंडा था वो तो पूरा हो ही रहा है।

इतिहास से छेड़छाड़ तो एक आपत्तिजनक मुद्दा है ही मुझे सबसे अधिक खतरा बाहुबलीय संगठनों से ही लगता है। आहिस्ता ‍आहिस्ता ये हमारे सामाजिक व्यवहार को ही प्रभावित कर रहें हैं। बरसो से बहुजातिय समुहों में हम रहते आए हैं। कभी‍ कभार अनबन हो ही जाती है। पर हमेशा दंगे तो नही पनप जाते। अब तो साहब माजरा ये ही रहता है, छुटभैये नेता छोटे‍मोटी तकरारों को सांप्रदायिक झगड़े के दावानल में झोंकने में पल भर भी नहीं सकुचाते। कल की ही बात है, मेरे शहर के एक हिस्से में एक बालिग सिन्धी युवती इलाके के ही एक मुसलमान युवक के साथ पलायन कर गयी। अखबार कहतें हैं पुरी रज़ामंदी थी। लड़की के परिजन बौखला गये, आप सोचेंगे उन्होने पुलिस की शरण ली, जी नहीं, वे गए बजरंग दल के पास। बस जंगल की आग की तरह खबर फैली। भाजपा विधायकों की उपस्थिती में, शासकीय बुलडोज़र से लैस होकर, बजरंग दल और दुर्गा वाहिनी के पहलवान कार्यकर्त्ताओं नें इस युवक की संपत्ति को नुकसान पहुँचाया, घर की तलाशी करवाई। इस से पनपे तनाव से दोनों समुदायों में नारेबाजी और पथराव भी हुआ, बस आग फैली नहीं गनीमत है। कैसा फील गुड है ये?

Thursday, February 26, 2004

वनवास से वापसी

तकरीबन ३ सप्ताह के ब्लॉग वनवास के बाद वापसी हो रही है। अभी पूर्ण रूप से मन भी नहीं बन पा रहा है। सब नया सा लग रहा है। १२ फरवरी को मेरी माताजी के पेट के अल्सर की शल्यक्रिया की गई। सब ठीक रहा, वो अब घर आ गईं हैं। सुखद बात ये रही कि एक ही चरण में ये शल्यक्रिया हो गई, सर्जन पहले इसे दो चरणों में करने वाले थे, तीन माह पश्चात एक शल्यक्रिया और होती, ईश्वर की कृपा से वह टल गया। किसी भी शल्यक्रिया में डर तो रहता ही है, माँ की उम्र व स्वास्थ्य के लिहाज़ से खतरा ज़रा ज्यादा था।

हिन्दी चिट्ठों कि दुनिया में इस बीच काफी हलचल हुई है लगता है। देखना है अपना मूड कब कब तक बन पाता है।

Thursday, February 05, 2004

पहला संस्कृत चिट्ठा

अत्यंत हर्ष की बात है कि चिट्ठों की दुनिया में पहला संस्कृत चिट्ठा जसमीत ने कौटिल्य उपनाम से लिखना प्रारंभ किया है। अहो भाग्यम्! आशा है वे नियमित रूप से लिखेंगे।

Wednesday, February 04, 2004

मेहमान का चिट्ठा: चारू

बाल मजदूरी और हम

एक सीधा‍ सादा सवाल करती हुँ, बाल मजदूरी क्या है? ज़रा इस व्यक्तव्य पर नज़र डालें...

विश्व में सबसे ज्यादा बाल मजदूर भारत में हैं, विश्वस्त अनुमानों के अनुसार भारत में बाल मजदुरों की संख्या ६ से ११.५ करोड़ के बीच है। शिवकाशी के पटाखा कारखानों में, बीड़ी और कालीन बनाने वाले, पत्थर के खदानों और धान के खेतों में कमरतोड़ मेहनत करने वाले बच्चों के बारे में तो सबने सुना है लेकिन उन बच्चों के बारे में कोई चर्चा नहीं होती जो आपके और मेरे घरों में काम करते हैं।

मुम्बई में मेरे घर काम करने वाली बाई हर रोज़ अपनी १३ साल की बेटी को अपने साथ लाती है। पहले पहल तो मुझे लगा कि शायद वो बच्ची को सिर्फ अपने संगत में रखना चाहती है, पर धीरे‍ धीरे उसने छोटे मोटे काम भी करना शुरू कर दिया। पहले पोंछा लगाने लगी, और अब हाल ये है कि वो अपनी माँ से १५ मिनट पहले आ कर काम शुरू कर देती है ताकि उसे आसानी हो। जब मैंने प्रतिरोध किया तो माँ का जवाब था, "दीदी, वो तो सिर्फ मेरे काम में हाथ बंटा रही है"। "..कल से उसे घर छोड़ कर आना", मैंने कहा। इस पर बाई का जवाब था, "उसे घर पर कैसे छोड़ सकतीं हूँ दीदी, वो तो अभी इत्ती छोटी है.."

देखा जाए तो मेरी बाई गरीब नहीं है। अपने मर्द के साथ मिल कर अच्छा खासा कमा लेती है, घर में टीवी है, बच्ची को स्कूल भी भेजती है। कहने का मतलब ये कि बच्ची का कहीं कोई शोषण नहीं हो रहा, ना ही अत्यधिक गरीबी की वजह से उसे काम करना पड़ रहा है...मुस्करा के काम करती है बिल्कुल जैसे मैं अपनी माँ की रसोईघर में मदद करती।

ये बच्ची स्कूल जाती है, अभी आठवीं कक्षा में है। क्या यह बच्ची अपने अधिकारों से वंचित है? क्या इसे बाल मजदूरी मान जाए? क्या इसमें मेरा भी दोष है? अगर हाँ तो इसका हल क्या है? क्या मैं अपनी बाई पर जोर डालूं कि वह अपनी बेटी को अपने साथ न लाए? पर क्या मैं उसे दूसरे घरों में काम करने से रोक पाउंगी? या फिर मैं इसे स्वीकार कर उसका काम और जीवन जितना हो सके उतना आसान बना दूं? दरअसल अभी तो मैं यही कर पाती हूं...पर...बाल मजदूरी का अंत फिर कैसे होगा?

"मेहमान का चिट्ठा" नुक्ता चीनी का पाक्षिक आकर्षण होगा। इस पक्ष की मेहमान मेरी मित्र श्रीमती चारुकेसी हैं। हाल ही में मुम्बई में बसीं चारु अपने अंग्रेज़ी चिट्ठे ए टाईम टू रिफ्लेक्ट में मुख्यतः सामाजिक और विकास के मुद्दों पर लिखती हैं।

Tuesday, February 03, 2004

क्या वोट डालना अनिवार्य कर देना चाहिए?

आज के दैनिक भास्कर में मनोहर पुरी ने अपने एक लेख* में एक महत्वपूर्ण बिंदू पर चर्चा की है। क्या वोट डालना अनिवार्य कर देना चाहिए? हालांकि लेखक के इस तर्क से मैं कतई सहमत नहीं कि वोट न डालने वालों को सरकार के कलापों पर नुक्ता चीनी का हक नहीं होना चाहिए पर हाँ जनतंत्र में अधिकारों के साथ कर्त्तव्यों को भी समान महत्व मिलना चाहिए।

वोट डालना अनिवार्य कर देना कई मामलों मे हम नागरिकों के लिए रामबाण औषधी सिद्ध हो सकती है। हो सकता है त्रिशंकू सरकारों से इसके द्वारा मुक्ति मिल सके। मतदान प्रतिशत बढेगा तो चुनाव प्रक्रिया अधिक सटीक हो सकेगी।

पर यह भी सच है कि हमारे देश में, जहाँ नागरिक चेतना (सिविक सेन्स) का नितांत अभाव है, वहां बिना शास्ती का डर दिखाए कोई नियम लागू नहीं किया जा सकता। वोट डालना अनिवार्य कर देने की घोषणा मात्र से कुछ नहीं होगा, उसका हश्र तो फिर पल्स पोलियो अभियान जैसा हो जाएगा। अगर मेरा नियोक्ता कहे कि वोट न डालने की स्थिति में वो मेरा दो दिन का वेतन काट लेगा तो बात मुझे सरलता से समझ आएगी। पुरी ने यह भी अच्छा सुझाव दिया है कि मतदानोपरांत अधिकारी हर मतदाता को एक पावती या प्रमाणपत्र दे सकता है जो इस बात की पुष्टि करेगा कि उसने वाकई मतदान किया है।

मेरे विचार मैं तो केवल मतदान और प्राथमिक शिक्षा ही नहीं बल्कि निम्नलिखित चीज़ों को भी अनिवार्य नागरिक कर्त्तव्यों में शुमार करना चाहिएः

  • अमेरिकी सोशियल सिक्युरिटी की तर्ज पर देश भर में मान्य परिचय‍ पत्र जिससे पासपोर्ट, राशन कार्ड, वोटर परिचय‍ कार्ड जैसे पच्चीसों गैरज़रुरी कागजो की जरुरत ना हो।
  • अनिवार्य एड्स परीक्षण, जिसके परिणाम को उपरोक्त परिचय‍ पत्र की दर्ज जानकारियों में शुमार किया जाए।

विचार तो अच्छे हैं पर बिल्ली के गले घंटी कौन बांधेगा?

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* स्थाई लिंक नहीं

Monday, January 26, 2004

अभिव्यक्तिः एक नया हिंदी चिट्ठा

शैल का हिंदी चिट्ठा अभिव्यक्ति इस श्रृंखला में एक और कड़ी है। लख लख बधाईयाँ शैल! हिंदी चिट्ठों की जमात में आपका स्वागत है।

Friday, January 23, 2004

प्रतिक्रिया पर एक प्रतिक्रिया

नुक्ता चीनी के एक पाठक शैल ने मेरे चिठ्ठे "राजनीतिक योग्यता क्या हो" पर प्रतिक्रिया लिखी हैः

बीजेपी को सोनिया से क्या समस्या है ये तो वो ही बता सकते हैं,लेकिन मुझे जो बात खटकती है वो है काँग्रेस की कुनबापरस्ती। आखिर ये लोग नेतृत्व के विचारों का प्रचार करने के बजाय इस बात पर क्यों बल देते रहते हैं कि सोनिया "गाँधी" हैं इसलिये हमें उनको वोट देना चाहिये।

शैल, अगर आप मुझ पर कांग्रेसी होने का शक न करें तो मैं ये कहुंगा कि वंशवाद का इल्ज़ाम सिर्फ गांधी घराने पर लगाना शायद पूर्णतः उचित नहीं है। क्या सुमित्रा महाजन अपने पुत्र को विधानसभा टिकट न मिलने पर मुँह फुलाए नहीं घूमतीं फिर रहीं? क्या राजस्थान की मुख्यमंत्री सिंधिया घराने की नहीं हैं? क्या फार्रुख अब्दुल्ला के पुत्र का राजनीतिक जीवन वंशवाद की उपज नहीं? अजीत सिंह व ओम प्रकाश चौटाला की राजनैतिक नींव किसने रखी? दरअसल हर पार्टी किसी न किसी करिश्माई व्यक्तित्व की तलाश में है जिसका हाथ थाम कर चुनावी वैतरणी पार हो जाए।

हाँ, कांग्रेस में बगैर गांधी उपनाम के करिश्माई बन पाना ज़रा टेड़ी खीर है। माधवराव सिंधिया व राजेश पायलट दोनों ऐसे व्यक्तित्व वाले थे पर अब वो हैं नहीं, सोनिया के नाम पर आम राय कभी थी ही नहीं। मनमोहन का व्यक्तित्व सौम्य हो पर मनमोहनी नहीं है, बचे कौन? नरसिंह राव, प्रणव मुखर्जी, नारायण दत्त तिवारी या मोतीलाल वोरा तो अब अकेले रथ खींचने के लिए ये सभी बहुत बुढ़ा चुके हैं। तिस पर इनकी कोई बहुत प्रभावी जनाधार भी नहीं है। जाहिर है निगाहें आ टिकी हैं प्रियंका और राहुल पर। कांग्रेसी मजबूरी का नाम...गांधी।

Thursday, January 22, 2004

नुक्ता चीनी का फीड

ब्लॉगर के सौजन्य से नुक्ता चीनी का एटम फीड अब उपलब्ध है। पाठक अगर नुक्ता चीनी नियमित रूप से अपने एग्रीगेटर के माध्यम से पढ़ना चाहें तो ये फीड काम की चीज़ है। बाक़ी की नहीं जानता पर ब्लॉगलाइन्स पर ये पढ़ा जा सकता है।

राजनीतिक योग्यता क्या हो?

सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर नया दल बना देने वाले शरद पवार उनसे राजनीतिक गठजोड़ के लिए तैयार हैं। जो मौका परस्ती न करें वो नेता भला क्या नेता! भाजपा भी इस मुद्दे को गरमाने के लिए तैयार है। कुछ ही दिनों पहले अटलजी भारतीय मूल के बॉबी जिंदल के लूसियाना के गवर्नर बनने की संभावना से बेहद उत्साहित थे, ग़र बॉबी जीत जाते तो शायद प्रवासी भारतीयों के बढ़ते कद पर वाजपेयी एक कविता लिख डालते। किसी भारतीय को विदेशी राजनैतिक पायदान पर चढ़ते देखना सुखद लगता है, भले ही वह खुद को भारतीय न मानता हो, पर किसी विदेशी का भारत में वैसा ही करना राजनैतिक नेत्रों में खटकता है। चाहे वो एक भारतीय से विवाहित स्त्री क्यों न हो। भले ही वह एक पूर्व प्रधानमंत्री देवगौड़ा से बेहतर हिन्दी बोल सकतीं हों।

दरअसल कोई भी ऐसी योग्यता जिस के आधार आप और मैं नौकरियों, परीक्षाओं में चुने जाते हैं राजनीति में चुने जाने का आधार नहीं बन सकतीं चाहे वह शैक्षणिक योग्यता हो, आयु सीमा या कार्य अनुभव। नतीजन हम अक्सर चुन लाते है निपट गँवार, अपराधी पृष्ठभूमि के लोग या ऐसे जिनके पांव कब्र में लटके हों। और चुनने की भी क्या कही! गठजोड़ की राजनीति के युग में आप भले ही सर्वश्रेष्ठ को वोट दें, इसका कोई भरोसा नहीं कि आपके ठुकराए दलों की सांठगांठ से सरकार नहीं बन जाएगी।

मैं कोई सोनिया भक्त नहीं, पर उनके विरोध के मुद्दे पर मुझे एतराज़ है। हालांकि सोनिया जैसे नए लोग हों या अटलजी जैसे अति अनुभवी, नुकसान दोनों को चुनने में है। जहां सोनिया जैसे नए रंगरुट नेताओं के उच्च पदों के आसीन होने से अफसरशाहों की चांदी हो जाती है और किचन कैबिनेट के मेम्बरान परोक्ष रूप से सरकार चलाने लगतें हैं, वहीं ज्यादा अनुभवी सूटकेस राजनीति में लिप्त हो जाते हैं। मेरा मानना है हमें कुछ बीच का रास्ता अख्तियार करना चाहिए।

Tuesday, January 20, 2004

अटली चेहरा सामने आए, असली सुरत छुपी रहे..

वीर सांघवी का कहना है (काफी हद तक मेरे विचारों से मिलता है)

"वाजपेयी का कद हमें भाजपा की असली सूरत देखने से रोक देता है। समीकरण से उन्हें निकाल तो हमें ऐसे लोगों का दल मिलेगा जिन्हें सामुहिक हत्याओं से गिला नहीं, जो साधुओं से राजनीतिक परामर्श लेते हैं और जिन्होंने चुनावी रणनीतियां बनाने की जिम्मेवारी टेंटवालों और बिचौलियों को सौंप रखी है।"

मेरा शुरू से ये मानना है कि अटल वाकई भाजपा का मुखौटा मात्र हैं (यह सचाई कहने का साहस गोविंदाचार्य में था जिस कारण से वे आज हाशिए पर हैं)। कमलेश्वर ने लिखा है,

"लोगों के मन में यह आशंका है कि चुनावों के बाद आडवाणी और मुरली जोशी अपना अटल वाला मुखौटा उतारकर हिंदुत्ववादी मोदी और तोगड़िया की शरण ले लेंगें।"
मेरा मन कहता है ये आशंका सच होने वाली है।

Sunday, January 18, 2004

बस मानसिकता सरकारी न हो

बड़ी खुशी होती है जानकर कि जिस जावा का प्रयोग मेरे जैसे प्रोग्रामर वेब व मोबाईल एप्पलीकेशन्शस बनाने के लिए करते हैं वही मंगल ग्रह पर स्पिरिट नामक रोवर को भी दौड़ा रहा है। वैसे सारा श्रेय नासा को ही जाना चाहिये, जैसा की गोसलिंग ने कहा, "नासा में लोग वो कर रहें हैं जो आम आदमी के लिए फंतासी जैसा है, ऐसी सरकारी संस्था का मिलना मुश्किल है जहां लोग अपने सपने सच कर पाते हों"। क्या भारत में कोई सुन रहा है?