नुक्ताचीनी का नया पता

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Friday, April 30, 2004

बात भूख की

डेनियल ने एक अनोखे वाकये का उल्लेख किया है जब भिखारियों ने दान किया जा रहा खाना यह कह कर ठुकरा दिया कि यह खाना गर्मियों के लिए उपयुक्त नहीं है। कारण जो भी हो, डेनियल का यह कहना काफी सही है कि दान के सहारे जीवनयापन करने वाले अब इससे इतने इतराए हुए हैं कि अब भीख भी उन्हें मन मुताबिक चाहिए। जैसा डेनियल ने कहा, ये लोग भूखे नहीं वरन आलसी और लालची लोग हैं।

मेरे कार्यस्थल पर आते और लौटते समय मुझे बरसों से एक उम्रदराज पर खासा हट्टा कट्टा भिखारी दिखता है। उसके एक हाथ में कुष्ठ रोग का कुछ असर है। अगर मैं और वह एक जैसी वेष भूषा में साथ खड़े हो जावें तो मैं शर्तिया कह सकता हूँ कि कमजोर काया के आधार पर भीख मुझे ही मिलेगी। बहरहाल यह जनाब बोलते कुछ नहीं, बस बाजू में आकर हाथ जोड़कर खड़े हो जाएँगे आपको निहारते रहेंगे। शुरूआत मे मैंने कुछ पैसे दिये भी। पर हर रोज आप उसी व्यक्ति को कैसे जरूरतमंद मान सकते हैं। इस देश में दिक्कत यह है कि कुष्ट जैसे रोग, शारीरिक अयोग्यता के आधार लोग आपसे इतनी हिकारत से पेश आते हैं कि आप मुख्यधारा में आकर अपनी रोजी रोटी कमा नहीं सकते, छोटे शहरों में परिवार में खुशी के मौकों पर और मुम्बई जैसे शहर में जब किन्नर जबरिया पैसे मांगते हैं तो मन में कई बार ये ख्याल आता है कि वाकई ये लोग इस तरह पेट ना भरें तो समाज कौन सा इन्हें कोई रोजगार मुहैया करा देगा।

वक्त के साथ ये मजबूरी आदत बन जाती है। भीख मांगना पेशा और अधिकार बन जाता है। सरकारी वितरण प्रणाली में इतने छेद हैं कि सारा अनाज चूहे और अफसर खा जाते हैं, सस्ता अनाज गरीब और जरुरतमंदों तक पहुँचता नहीं। भूखे की भूख बनी रहती है, टैक्स चोरी से पनपते धनाढ्य दान दे कर फील गुड करते हैं।

Tuesday, April 27, 2004

हालिया चिटठों की कड़ियां

अगर आपने गौर किया हो तो इस चिट्ठे में दाँयीं ओर "हाल के चिट्ठे" दिखते हैं, दरअसल ये जावास्क्रिप्ट इस चिट्ठे के एटम फीड को पार्स करके बनायी गई है। अगर आप अपने ब्लॉग पर इसका उपयोग करना चाहते हैं तो निम्नलिखित कोड यथास्थान पर पेस्ट कर दें। ब्लॉगर.कॉम वाले तो इसका सीधा प्रयोग कर सकते हैं अन्य <$BlogSiteFeedUrl$> के स्थान पर अपने एटम फीड का URL दें। ध्यान रहे, यह एटम फीड पर ही काम करेगा, RSS या RDF फीड पर नहीं।

<script language="javascript" type="text/javascript" src="http://www.myjavaserver.com/~javaman/RecentPosts.jsp?feed=<$BlogSiteFeedUrl$>"></script>

यह आधारित है ब्लॉगस्ट्रीट के RSS पैनल पर, पर ब्लॉगस्ट्रीट एटम का प्रारूप अभी नहीं समझता है। यदि आप 2RSS जैसी सेवा का प्रयोग कर अपने एटम फीड को RSS में परिवर्तित भी कर दें तब भी ब्लॉगस्ट्रीट इसे दर्शा नहीं पाता है। यदि आपको ऐसी किसी मुफ्त सेवा का पता हो तो अवश्य बतायें।

नए पड़ाव

खुशी की बात है कि हिन्दी ब्लॉग के काफिले में नए राही जुड़ते जा रहे हैं। नवागंतुक वैभव पाण्डेय का स्वागत है। इस बीच नजर पड़ी ब्लॉगडिग्गर पर। जानकर अच्छा लगा कि यह कोई साधारण एग्रीगेटर नहीं वरन आपको चिट्ठों का समूह बनाने में भी मदद करता है। ऐसा समूह बनाने का एक लाभ यह हो सकता है कि एक जैसे चिट्ठे एक जगह जमा हो और उनके नवीनतम चिट्ठों के संक्षिप्त रुप एक ही पृष्ठ पर मिल जावें और सोने पर सुहागा हो अगर उनका एक ही संयुक्त आर.एस.एस फीड हो।

अतः देर न करते हुए मैंने हिन्दी चिट्ठों का एक समुह बना ही डाला। इस समुह का फीड URL है http://www.blogdigger.com/groups/rss.jsp?id=130 और सम्मिलित चिट्ठों की सूची ओ.पी.एम.एल प्रारूप में भी यहाँ उपलब्ध है। फिलहाल समूह के मुखपृष्ठ पर चिट्ठों के नाम सही तरीके से दिख नहीं रहे, मेरे ख्याल से अभी इस सेवा में सुधार की काफी गुंजाईश है। चुंकि यह अभी बीटा में ही है इसलिए थोड़ा और इंतजार करना चाहिए। वैसे ब्लॉगलाईन्स पर समूह की फीड बढिया दिख रही थी। उम्मीद की जाए कि मैं और ब्लॉगडिग्गर दोनों ही इन्हें ताजातरीन रख पायेंगे।

Wednesday, April 21, 2004

काव्यालय ~ इस सफ़र में

मैंने कवि बनने की अपनी नाकाम कोशिशों का ज़िक्र इस चिट्ठे पर कभी किया था। उन दिनों गज़ल लिखने पर भी अपने राम ने हाथ हाजमाया, बाकायदा तखल्लुस रखते थे साहब, बेबाक। तो उन्ही दिनों की एक गज़ल यहां पेश है। अगर उर्दु के प्रयोग में कोई ख़ता हुई हो तो मुआफी चाहुँगा।

इस सफ़र में बहार के निशां न मिले
जहाँ गई भी नज़र, सूखे से दरख्त मिले।

मेरी ख़ता कि अब बूढ़ा बीमार हूँ मैं
शर्म आती है उन्हें सो अकेले में मिले।

रहनुमा1 कहतें हैं तोड़ेंगे वो पुराने रिवाज़
हमें तो सब मुबतला2 अक़ीदों3 में मिले।

हैरां हूँ क्या हो जाती है मुहब्बत ऐसे
गोया दो चार दफ़ा हम जो बग़ीचों में मिले।

मिल्क़यत लिख वो गुज़रे जो 'बेबाक' के नाम
हमदम बनने को रक़ीब4 रज़ामंद मिले।


1. रहनुमा = राह दिखाने वाला (Guide)
2. मुबतला = जकड़े हुए (Embroiled In)
3. अक़ीदा = मत (Doctrine Of Faith)
4. रक़ीब = दुश्मन (Enemy)

Sunday, April 18, 2004

रहिमन माया संतन की..

उज्जैन में सिंहस्थ की खबरों में बड़ा अजीब विरोधाभास नजर आता है। भई, बचपन से हम को तो यही सिखाया-बताया गया है कि साधु वैराग का दूसरा नाम होते हैं; मोह-माया, मानवीय कमजोरियों, वर्जनाओं से परे, गुणीजन होते हैं। हो सकता है कि कलियुग की माया हो, वरना मुझे तो ऐसे कुछ संकेत दिखे नहीं। खबरों पर सरसरी नजर दौड़ाएँ तो पता चलेगा कि फलां साधु करोड़ों का चैक भुनाने बैंक पहुँचे, एक आगजनी में साधुओं के टेंट में लाखों के नौट सुलगते देखे गये, आगजनी से क्षुब्ध साधुओं ने कलेक्टर पर कीचड़ उछाल दी और अधिकारियों से हाथापाई की।

कुल मिलाकर मुझे तो सर्वत्र यही दिखता है कि इस सर्वधर्म समभाव वाले देश में, जहाँ कहने को तो राज्य का कोई मज़हब नहीं है (the state has no religion), धर्म के नाम पर आप समाज की माँ-भैन कर सकतें हैं, कोई माई का लाल चूँ-चपड़ नहीं कर सकता। अगर आप नंगे घूमें तो समाज पागल कह कर आप पर पत्थर बरसायेगा और ग़र आप एक नागा साधु हैं तो समाज की औरतें अपने पतियों की उपस्थिती में आपका पैर धो कर पियेंगी। ऊपर उल्लेखित अगर एक भी खबर सच्ची है तो मैं तो ये मानुंगा कि ये *ले साधु नहीं, निरे कपटी और ढोंगी हैं, सोने-चांदी के जेवर चमकाने के बहाने ठगी करने वाले लोगों से भी अधम हैं ये लोग। पर समाज है कि आंखे मूंदे पड़ा है। तोगड़िया बोलते हैं, "अटल जी हमारे मामले में न बोलें, अयोध्या हो जाने दीजीए फिर ३०,००० अन्य मस्जिदों की बारी है।" मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री ताल ठोंक कर कहतीं हैं, "हाँ, मैं संघ परिवार के साथ मिलकर सरकार चला रही हूँ।" उधर भाजपा कहती है मुसलमानों का पार्टी में विश्वास बढ़ता जा रहा है।

कैसा धर्म-निरपेक्ष राज्य है यह? रहीम आज होते तो जाने क्या सोचते!

Thursday, April 08, 2004

मेहमान का चिट्ठाः हेमन्त

बॉलीवुड और चोरी की प्रेरणा

विगत दिनों जब बार्बरा टेलर ने सहारा टीवी के धारावाहिक करिश्मा को कॉपीराईट उल्लंघन के आधार पर बंद करवाने की धमकी दी थी तो बॉलीवुड में सपने बुनने के कारखाने को तो जैसे साँप सूँघ गया था। हालाँकि बाद में बार्बरा मान‍ मनोव्वल से बस में कर ली गईं पर इस घटना से बॉलीवुड की कई हस्तियों की कई रातों ओर दिनों की नींद जरूर हराम हो गई होगी। इस घटनाक्रम से न केवल बॉलीवुड की चोरी की आदतों का भंडाफोड़ हुआ वरन् इससे दुसरी "आधार सामग्री" पर उनकी पूर्ण निर्भरता और हॉलीवुड से जुड़ी अदृश्य नाभिरज्जू का खुलासा हो गया। यह निंदनीय प्रवृत्ति बॉलीवुड में सर्वव्याप्त क्यों है? मेरा मानना है कि इसके बीज काफी पहले बो दिए गये थे।

बॉलीवुड का जन्म उसके नाम की तरह हॉलीवुड की कोख से हुआ है। उसकी शुरुआत चलचित्र और बोलती फिल्मों के अविष्कार के लगभग बाद ही हुई। उन दिनों यह आम बात थी कि निर्देशक या निर्माता या अभिनेता ‍(या सभी) अंग्रेज़ या अमरीकी हों। उस समय के कई विशिष्ट भारतीय निर्देशकों ने इस कला में महारत हासिल करने के लिए विदेश में प्रशिक्षण भी प्राप्त किया। (दादासाहेब फाल्के भी १९१० में बनी "द लाईफ आफ क्राईस्ट" से प्रेरित हुए थे जो उन्होंने बम्बई में देखी थी।) इससे पश्चिम का प्रभाव अवश्यम्भावी रूप से पड़ा। दरअसल हमने इस पश्चिमी प्रभाव से शुरुआती दौर में काफी कुछ सिखा है और आज जो भी हम हैं (कुछ क्षेत्रों में) उसका बहुत सा श्रेय इसको जाता है। दुर्भाग्यवश, भारत के लिये (आपके नजरिये पर निर्भर है) इन बाहरी तत्वों का दिया सहारा या नियंत्रण भारतीय सिनेमा की आत्मा में गहरा समा गया प्रतीत होता है।

राजकपूर सदृश शोमैन भी पीछे नहीं रहे। अपने चार्ली चैपलिन नुमा खानाबदोश किरदारों के द्वारा उन्होंने दर्शकों का दिल जीतने की ठान ली। यह काम कर गया, और वो अकेले नहीं थे। इस प्रारंभिक व्याख्या का हुबहू खाका प्रयोग कर दूसरे फिल्म निर्माताओं ने भी सफलता हासिल की। बॉलीवुड की स्थिती उसकी व्यथा है। बम्बई में होते हुए इस उद्योग को गैर व्यवसायिक तौर पर चलाया जा सकता है भला! जाहिर है, यहाँ चलचित्र को संचार के नहीं निवेश के माध्यम के रूप में देखा जाता है।

भारतीय दर्शक वर्ग दूसरों से काफी भिन्न है; बस उनका पैसा वसूल होना चाहिए। एक कठिन और थकानेवाले दिन के उपरांत उन्हें शुद्ध मनोरंजन चाहिए, सामाजिक समस्याओं पर कोई पाठ नहीं। नतीजन, भारतीय सिनेमा की मुख्यधारा जल्दी ही फार्मूला फिल्में बनाने तक सिमट गई। जो भी चलचित्र इस प्रथा को तोड़ता उसे "कला सिनेमा" करार दे कर बड़े शहरों और दूरदर्शन पर रविवार दोपहर के प्रसारण समय तक सीमित कर दिया जाता। हैरत की बात नहीं कि बॉलीवुड के फिल्मकारों की पुश्तें निर्माताओं के एक ही उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसके हाथ की कठपुतलियां बनती रही हैं, बॉक्स आफिस पर सफलता। "सड़क" से "जिस्म" तक, निर्देशकों को लगता है कि उनके पास "हिट" बनाने का सीधा जवाब मौजूद है। किसी सफल हॉलीवुड चलचित्र का हिन्दी पुर्ननिर्माण कर इक्का दुक्का जगह बदलाव कर दिया और तैयार हो गई एक "प्रेरित" पटकथा। क़ैद नाज़मी ने द वीक में अपने लेख बॉलीवुड कॉपीकैट्स में पटकथा लेखक की दुःखद दास्तान का ब्यौरा दिया है। कोई चलचित्र उद्योग जो अपने पटकथा लेखकों के साथ इतना बुरा बर्ताव करता हो वह भला स्वस्थ प्रवृत्ति या मौलिकता की डींग कैसे मार सकता है? पर ये भी मानना होगा कि सिनेमा निर्माण करने वाले हर देश ने हॉलीवुड के रद्दी फार्मुला का अनुसरण करने का प्रयास किया है। ऐसे में सिर्फ बॉलीवुड पर क्यों ऊँगली उठाई जाए?

इसके विपरीत कि भारत (और काफी हद तक बॉलीवुड) रिकॉर्ड संख्या में फिल्मों का निर्माण करता है, हमने हॉलीवुड (या विश्व सिनेमा) पर शायद ही कोई असर डाला होगा। नजर डालें १९६० की फ्रांसिसी नई लहर पर (जिसने हॉलीवुड के सिनेमा निर्माण में क्रांति ला दी) या इतालवी नवीन वास्तविकता वादी सिनेमा पर या जापानी कला-कौशल युक्त सिनेमा (स्टार वार्स कुरुसावा की समुराई चलचित्रों से प्रभावित हुआ था) अथवा चीन और हांगकांग के कुंग फू चलचित्र। बॉलीवुड ने क्या बदला है? कुछ नहीं। हमारे लिए यह एक‍ तरफा रास्ता रहा है।

अगरचे कोलकाता उच्च न्यायालय ने बार्बरा की अर्जी खारिज न कर कोई दृष्टांत पेश किया होता तो हो सकता है कि बॉलीवुड की नींद खुलती और सबक सीखा होता। उसके बिना बॉलीवुड बस इसी विश्वास पर आगे बढ़ता रहेगा कि हॉलीवुड तो है ही "प्रेरणा" प्राप्त करने के लिए।

हेमंत कुमारइस पखवाड़े के मेरे मेहमान हेमन्त कुमार फिल्मों के दीवाने हैं। यहाँ तक कि वे रिर्जवॉयर डॉग्स के पात्र एडी कि तरह "नाईस गाई" कहलाना पसंद करते हैं। मूलतः मद्रास निवासी हेमन्त भारतीय और हॉलीवुड पर पैनी नज़र रखते हैं और हर तिमाही अपना ब्लॉग टेम्पलेट जरूर बदलते हैं (मज़ाक कर रहा हुँ यार)। अपने मुख्य चिट्ठे के अलावा हेमन्त तमिल सिनेमा पर खास चर्चा अपने अन्य ब्लॉग टीकाड़ा में करते हैं।

Tuesday, April 06, 2004

बकाया बातें

फिर वही दौर जब चिट्ठे पढ़ता तो हूँ पर कुछ लिखने का जी नहीं करता। ऐसे में सोचा कुछ बकाया बातें कर ली जाएं। पहले हिन्दी के तकनीकी शब्दों के प्रयोग से संबंधित एक बात। शायद आप को ञात हो, की सूचना प्रोद्योगिकी से संबंधित शब्दों के अंग्रेज़ी से हिन्दी मान्य तजुर्मे यहां उपलब्ध है।

दूसरी बात अन्य भारतीय भाषाओं में चिट्ठों की, पिछले एक चिटठे में मैंने इसका ज़िक्र किया था कि बांगला में एक भी चिट्ठा नहीं दिखा। सुकन्या दी के सहयोग से मैंने इस दिशा में कुछ शुरुआत करने की सोची और जन्म हुआ प्रथम बांग्ला ब्लॉग का। मूलतः यह चेष्टा है बांग्ला भाषिओं को बांग्ला युनिकोड का प्रयोग कर अपना चिट्ठा प्रारंभ करने के लिए प्रेरणा देने की। सुकन्या दी ने स्वयं अपना बांग्ला ब्लॉग भी शुरु किया है और जाहिर है जरुरत एक बांग्ला ब्लॉग डायरेक्टरी की भी थी।