नुक्ताचीनी का नया पता

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Tuesday, May 03, 2005

जेनेरिक गोरखधंधा

पुणे में आईटी वालों की भरमार है। शहर भी ऐसा है कि लोग बस जाने की सोचते हैं। शहर भी आखिर कितना समोये, सो गुब्बारे की तरह फैल रहा है। वैसे यहाँ के औंध और बानेर जैसे इलाके लोगों की पहली पसंद हैं, सुविधाओं और कार्यस्थल से नज़दीक होने के कारण। चुंकि दावेदार ज्यादा हैं तो दाम सर चढ़कर बोल रहे हैं। हजारों की संख्या में नये प्रोजेक्ट आ रहे हैं। लोकल अखबारों को विज्ञापन समेटने के लिये अतिरिक्त परिशिष्ट निकालने पड़ रहे हैं। मज़े की बात यह की शहर के किसी भी कोने में बना हर अपार्टमेंट पहले से ही ७० प्रतिशत बुक्ड होता है, अब लीजिये पांचवी मंजिल का फ्लैट जहाँ टैरेस किचन में खुलता है, लिविंग रूम में नहीं। यह तो तब, जब अंटी में खासी रकम हो। मध्यम वर्गीय परिवार के लिये आस लगाये बैठने के अलावा चारा नहीं।

खैर जो बात कहना चाहता था वह रह ही गई। अपने आफिस के नज़दीक औंध जैसे अच्छे इलाके में ज्यादातर लोग आशियानां बनाना चाहते हैं। जब आप फ्लैट देखने पहूँचे तो पहली नज़र में ही लगेगा कि काफी बहुत दूर है। "अजी दूर कहाँ, ये जेनेरिक औंध हैं", बिल्डर तपाक से कहेगा। आप खुश! अभी कुछ दिन पहले अखबार में एक पाठक का पत्र पढ़ा। लिखा था, "सारी जिंदगी पुणे में बिता दी, शहर के चप्पे चप्पे से वाकिफ हूँ पर आज तक कभी औंध एनेक्स या जेनेरिक औंध नहीं देखा।" भई देखेंगे तो तब जब ये होंगे। दरअसल ये सारी मिलीभगत बिल्डरों की ही है। अब औंध से २०-२५ किमी दूर के इलाके भी इन्होंने औंध में खींचने के ईरादे से इन नये काल्पनिक नामों की रचना कर दी। शहर में नये आये लोगों को औंध से मीलों दूर का इलाका औंध के नाम पर बेचना आसान है इस तरह। बड़ा अजीब गोरखधंधा है यह। इनका बस चले तो लोनावला को भी पुणे एनेक्स पुकारने लगे कल।

Monday, May 02, 2005

नैन भये कसौटी

दूरदर्शन पर "गोदान" पर आधारित गुलज़ार की टेलिफिल्म आ रही है। पंकज कपूर के किरदार का मृत्यु द्श्य है। श्रीमतीजी, पुत्र और मैं सभी देख रहे हैं। पर अविरल अश्रु बह रहे हैं मेरी आँखों से। जी नहीं, बंद कमरे में भला आंखों में किरकिरी कैसी? यह कोई नयी बात नहीँ है। टी.वी. हो या फिल्म, कोई पात्र दम तोड़ रहा हो या हो कोई भारी इमोशनल सीन, मेरे नेत्र फफकने में देर नहीं लगाते। मज़ा तब और आता है जब मैं अपनी माँ के साथ बैठा हूँ, तब दो जोड़ी आँखों से बहती गंगा जमुना का दृश्य भी देखा जा सकता है।

मैं अंदाज़ लगा सकता हूँ आप क्या सोच रहे हैं इस समय। हैं! पुरुष होकर रोता है? रोना तो मूलतः जनाना गुण है। भई क्या करें, "मर्द को दर्द नहीं होता" या "ब्यॉज़ डोंट क्राई" जैसे जुमले अपने लिये फिट नहीं बैठते। इतने वर्षों के अनुभव के बाद तो अब मेरी आँखें भावनाओं की गहराई नापने की कसौटी बन चुकी हैं। हर ऐरे गैरे दृश्य पर नहीं बहती ये धारा।

अब तो कोई ऐसा दृश्य शुरु हुआ नहीं कि पत्नी बार बार पलट पलट कर मेरे नैनों में झांक लेती हैं। मैं प्रयास करता हूँ कि टोंटी बंद रहे, गला ईमोशन से चोक हुआ जाता है, आखों का मर्तबान लबालब भरा, पर कोशिश जारी रहती है, हो सकता है दृश्य खत्म होने तक भाप बनकर उड़ जायें। पर १०० में से ९० मौकों पर ऐसा होता नहीं। पत्नी कनखियों से मेरे डबडबाते नैन देख कर मुस्करा भर देती हैं, ज्यों कहती हों कि चलो रो लो जी भर, मैंने नहीं देखा। पर म्युनिसिपल्टी की नलों की नाई सुष्क उनकी भली आँखों में नाराजगी साफ दर्ज होती है, "कभी दो आँसू मेरे लिये भी टपका लिया करो आर्यपुत्र!"