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Friday, March 05, 2004

संचार माध्यम और सामाजिक दायित्व

भारतीय टेलिविज़न परिदृश्य के सन्दर्भ में बात करें तो आप को दो स्पष्ट समूह मिलेंगे। एक ओर तो सरकारी टेलिविज़न दूरदर्शन है और दूसरी तरफ उपग्रह चैनलों का झुण्ड। दोनों की कार्यप्रणालियों में खासा अंतर है। दूरदर्शन पारंपरिक तौर से सत्तारूढ़ दल का सरकारी भोंपू बना रहा है। अगर इस बात को नज़रअंदाज़ कर सकें तो पायेंगे कि दूरदर्शन स्पष्टतः ऐसे कार्यक्रमों का भी निर्माण भी करता रहा है, जिनकी उपग्रह चैनलों के कार्यक्रम निर्माताओं से कभी अपेक्षा नहीं की जा सकती। उदाहरण के लिए, क्या आप उम्मीद रख सकते हैं कि ज़ी टीवी या स्टार प्लस कभी "कृषि दर्शन" या "नृत्य का अखिल भारतीय कार्यक्रम" जैसे कार्यक्रम या गुमनाम वृत्तचित्रों का प्रसारण करेगा? मेरा ईशारा संचार माध्यमों के सामाजिक दायित्व की ओर है।

उपग्रह चैनलों की मजबूरी जगजाहिर है। टी.आर.पी और मुनाफा कमाने की होड़ में उनके पास सास‍ बहू, रोना धोना और बदन दिखाउ रीमिक्स विडिओ दिखाने के अलावा और चारा भी क्या है। उन्हें दूरदर्शन की तरह अनुदान की दक्षिणा थोड़े ही मिलती है। हालांकि प्रसार‍भारती के जन्म के बाद से दूरदर्शन को भी पैसे कमाने पड़ रहे हैं और उनके दृष्टिकोण के बदलाव को महसूस भी किया जा सकता है। कहाँ गए वो वृंदगान और टेलिनाटिकाएं! शुक्र है कुछ अच्छाई अभी भी शेष है।

जासूस विजय: जागरुकता मनोरंजन सेहालिया कार्यक्रमों में मुझे जासूस विजय बड़ा पसंद आया। एड्स और महिलाओं के प्रति सामाजिक रवैये के प्रति जागरूकता लाने के उद्देश्य से बी.बी.सी और नेको द्वारा निर्मित ये पुरस्कृत जासूसी धारावाहिक काफी मशहूर भी हो गया है। अभिनेता ओम पुरी इसमें सूत्रधार की भुमिका निभाते हैं। धारावाहिक मुलतः ग्रामीण दर्शक वर्ग के लिए है पर इसका कलेवर बड़ा रोचक है, दर्शकों को मौका दिया जाता है कि वो असली अपराधी की पहचान के ईनाम जीत सकें। जो चीज़ मुझे भाती है, वह है इस धारावाहिक में मनोरंजन तथा शिक्षा का सही मिश्रण। रोमांच और मसाले से भरपूर कहानी के द्वारा असल संदेश बेलाग स्थानीय भाषा में घर घर पहुंच रहा है। एक रोचक बात ये है कि इस कहानी के मुख्य किरदार यानि जासूस विजय, जिसे मंजे हुए कलाकार आदिल खंडकार हुसैन निभा रहे हैं, को भी एच.आई.वी ग्रस्त बताया गया है। जैसे जैसे कहानी आगे बड़ रही है और विजय का साथी किरदार गौरी के साथ प्यार पनपता दर्शाया जा रहा है एक बड़ा नाजुक सवाल भी खड़ा हो जाता है, क्या एक एच.आई.वी ग्रस्त व्यक्ति को विवाह का अधिकार मिलना चाहिए?

इस धारावाहिक को अनेक भारतीय भाषाओं में डब किया जाता है और ताजा खबर ये है कि अब इसे थाईलैंड तथा कंबोडिया में भी प्रसारित किया जाएगा। एक और अच्छा धारावाहिक एड्स पर जागरूकता लाने के लिए चल रहा है "हाथ से हाथ मिला" जिसमें दो बसों में युवा यात्री शहर और गाँव जा कर लोंगो को कॉन्डोम के इस्तमाल के प्रति जागरूक करते हैं। इन कार्यक्रमों के निर्माताओं को मेरी बधाई!

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इस चिट्ठे का अंग्रेज़ी रुपांतरण यहां उपलब्ध है।

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