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Sunday, January 01, 2006
Wednesday, November 30, 2005
हर तरह से पसंद हैं फिल्में
फिल्में क्यों देखता हूँ? मुझे अच्छा लगता है। हम सभी आक्सीजन, जल और हवा पर जीते हैं पर मन की खुराक कुछ और ही होती है। फिल्में मुझे भाती हैं। जब कभी मन खराब होता है तो यह मुझे गुदगुदाकर हंसा देती है, जब अकेला होता हूँ तो मेरा साथ देती हैं, जब परिवार और मित्र साथ होते हैं तो बढ़िया दोस्त बन जाती है। आजकल तो खैर सिनेमा हॉल जाकर फिल्म देखना मुश्किल होता है तो टीवी या कंप्यूटर ही माध्यम बने हैं सिनेमा दर्शन के। मैंने अक्सर यह सोचा है कि मुझे किस तरह की फिल्में पसंद हैं पर सचाई यही लगती है कि स्थितिजन्य कारणों से कोई फिल्म पसंद आती है और कोई नहीं, कई बार उद्देश्यपूर्ण सिनेमा पसंद आ जाता है तो कई बार बेसिरपैर का धमाल भा जाता है। शायद इसीलिये सलाम नमस्ते पसंद आई पर जेम्स नहीं, सत्या अच्छी लगी पर सेहर नहीं।
फिल्मों के अलावा मुझे फिल्म निर्माण की तकनीक में भी खासी रुचि रहती है, शायद यह बहुत लोगों को पसंद होता है शायद इसीलिये "बिहाईंड द सीन्स" कार्यक्रमों की भरमार है छोटे पर्दे पर। पहले जैकी चैन की फिल्मों के "एंड क्रेडिट्स" के पहले "गूफ अप्स" और खतरनाक शॉट्स के नज़ारों का इंतज़ार रहता था आजकल तो तकरीबन हर फिल्म में यह करने का रिवाज़ हो गया है। बहुत पहले मुम्बई दूरदर्शन से एक कार्यक्रम आता था, "बातें फिल्मों की" जिसे बेंजामिन गिलानी प्रस्तुत करते थे, यह फिल्म निर्माण विधा पर बड़ा अच्छा कार्यक्रम था, तब मैं छोटा था पर मुझे यही लगता था की मैं बड़ा होकर फिल्म निर्माण ज़रूर करूंगा, बाबा ने एक मिनी प्रोजेक्टर भी ला दिया था, फिल्मों के टुकड़ों को माँ की साड़ी तब तक दिखाना जब तक की ब्लब वाला टीन का डिब्बा इतना गर्म न हो जाय जब तक की जलने की बू आने लगे। गणेशोत्सव के समय मुहल्ले के सबसे बड़े मैदान पर फिल्म दिखाई जाती तो बड़ा मज़ा आता, चादर बिछा कर प्रोजे्क्टर के सबसे नज़दीक बैठने की होड़ होती, उससे निकलते प्रकाश के रेले में तैरते कणों पर ही नज़र टिकी रहती, और जब गर्मी कई बार रील पिघलकर टूट जाती तो ऐसा लगता की परदे पर किसी ने मर्तबान भर शहद फेंक दिया हो, तब अपना मिनी प्रोजेक्टर याद आ जाता।
फिल्मों में जो चीज़ भाती है वह संगीत भी है। फिल्मी संगीत तो खैर भारतियों की रुह में बसती है। आजकल संगीत फिल्म के काफी पहले जारी हो जाता है, फिर चैनलों पर लगातार बजते बजते हिट भी घोषित हो जाता है। बावजूद इसके मुझे लगता है कि कर्णप्रिय संगीत अक्सर सुनने को मिल जाता है, हीमेश रेशमिया, प्रीतम जैसे नये लोग नये संगीत के साथ मकबूल हो रहे हैं। आजकल की फिल्मों में हॉलीवुड की नकल की बजाय उसकी तर्ज पर चलने का माहौल गर्माया है, "एक अजनबी" जैसी फिल्मों के साथ हॉलिवुड के कथित निर्देशक भी मैदान में हैं। इससे अब्बास मस्तान, विक्रम भट्ट और संजय गुप्ता जैसे निर्देशकों को, जो या हॉलिवुड की फिल्मों से सीधे "इंस्पायर" हो जाते रहे हैं को सबक मिलेगा। हमें हॉलीवुड जैसी प्रोफेशनलिज़्म और प्रबंधन तथा तकनीकी कौशल को अपनाने की ज्यादा ज़रूरत है बनिस्बत की इनकी पटकथाओं का अनुसरण करने की। फिल्में जल्दी बनें, पेशेवराना रूप से बने, तो लागत भी घटे।
फिल्में मुझे हर रूप में पसंद आती हैं, चाहे फंतासी हो या यथार्थ के नज़दीक। आजकल की फिल्मों में खास यह बात अच्छी लगती है कि तकनीक बढ़िया हुई है और अदाकारी से भी हैम और मेलोड्रामा का अंश लगभग खत्म हो गया है। सुना है की भारतीय कंपनियाँ एनीमेशन और स्पेशल अफेक्ट्स में हॉलिवुड से काम पा रही हैं। मुझे इंतज़ार उस दिन का रहेगा जब हम जूरासिक पार्क जैसी कोई करिश्माई फिल्म मूल पटकथा और अपने माद्दे पर बनायेंगे, जिसे आस्कर में किसी से होड़ नहीं करनी होगी।
Thursday, October 27, 2005
आवरण ~ चिट्ठों के ब्लॉगर टेम्प्लेट
Tuesday, October 04, 2005
खेलों देशभक्ति का विकेंद्रीकरण
अगर आप सोच में पड़ गये या फिर आपका जवाब क्रिकेट, टेनिस जैसा कुछ था तो जनाब मेरी चिंता वाजिब है। हमारा राष्ट्रीय खेल हॉकी है। पर पिछले कई दशकों में खेलों की हवा का रुख कुछ यों हुआ है कि हम मुरीद बने बैठे हैं एक औपनिवेशिक खेल के। और इस खेल में भी चैपल-गांगुली की हालिया हाथापाई दे तो यही पता चलता है कि खेलों पर आयोजक, चैलन, चयनकर्ता और राजनीति इस कदर हावी हो गई है कि अब खिलाड़ी और कोच भी अपने हुनर नहीं राजनीतिक दाँवपेंचों के इस्तेमाल में ज्यादा रुचि दिखाते हैं।
हम बरसों से सुनते देखते आये हैं राष्ट्रीय और आलम्पिक्स जैसे अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं में चयन के सियासी खेल की, कहानी जो हर बार बेहयाई से दोहराई जाती है। हमारे स्क्वॉड में जितने खिलाड़ी नहीं होते उनसे ज़्यादा अधिकारी होते हैं। हॉकी जैसे खेल, जिनमें हम परंपरागत रूप से बलशाली रहे, में हम आज फिसड्डी हैं और निशानेबाजी जैसे नए खेलों पर अब हमें आस लगानी पड़ रही है। 100 करोड़ की जनसंख्या वाला हमारा राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं में एक स्वर्ण पदक के लिये तरसता है।
हम यह भी सुनते रहते हैं कि भारतीय ट्रैक एंड फील्ड आयोजनों में स्टैमिना के मामले में युरोपिय देशों का सामना नहीं कर सकते, या फिर कि अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने जानबूझ कर हॉकी जैसे खेलों के नियमों में इस कदर बदलाव किये हैं कि सारा खेल ड्रिबलिंग जैसे एशियाई कौशल की बजाय दमखम का खेल बन गया। मुझे यह समझ नहीं आता कि कब तक हम ये बहाने बनायेंगे। चीन भी तो एशियाई देश है और हॉकी पाकिस्तान भी खेल रहा है। अंतर्राष्ट्रीय खेलों को छोड़ें, हमारे अपने घरेलू स्तर पर कितने बड़े आयोजन होते हैं? क्या स्कूलों में क्रिकेट के अलावा किसी और खेल पर जोर दिया जाता है?
जाने आपने यह टाईम्स में प्रकाशित गेल आम्वेट का यह हालिया लेख पढ़ा की नहीं! उन्होंने अमरीका से तुलना करते हुये बहुत ही अच्छा विश्लेषण पेश किया है। मुझे उनका यह विचार बड़ा रोचक लगा कि, "छोटी या स्थानीय देशभक्ति से खेलों का प्रजातांत्रिक विकेंद्रीकरण हो सकेगा और इससे खेलों की राष्ट्रीय देशभक्ति फलेगी फूलेगी ही"। गेल का कहना यही है कि खेल की देशभक्ति भारत में केवल अंतर्राष्ट्रीय स्तर के आयोजनों के लिये ही सामने आती है जबकि अमेरिका में ऐसा नहीं हैं।
तकरीबन कोई भी ध्यान नहीं देता अगर अमेरीका किसी अन्य देश के साथ खेल रहा हो जब तक की मामला आलम्पिक्स का न हो। अमेरिका में बड़े खेल राष्ट्रीय स्तर पर नहीं बल्कि महानगरीय या राज्य विश्वविद्यालय स्तर पर होते हैं...वहाँ छोटे शहरों, स्कूलों के स्तर पर देशभक्ति है। हर हाईस्कूल का अपना चिन्ह है, गीत है, विरोधी हैं। अमेरिका का ध्यान केवल फुटबॉल, बास्केटबॉल, बेसबॉल जैसे बड़े खेल ही नहीं खींचते। बच्चे हर स्पर्धा में भाग लेते हैं, बैडमिन्टन, टेबल टेनिस, बॉली बॉल, आइस हॉकी, जो भी खेल हो।
निःसंदेह दिक्कतें और भी हैं। कब्बडी, खोखो, मलखम्ब जैसे घरेलू खेलों के खिलाड़ियों का न तो नाम हमारे राष्ट्रीय अखबारों में आता है न ही कोई उन पर पैसा लगाने को तैयार होता है। पैसों की बात तो अहम है, खास तौर पर जब खेल टेनिस जैसा ग्लैमर वाला न हो। कई दफा यह लगता है कि खेलों का बजट आखिर रक्षा या विज्ञान जितना क्यों नहीं होना चाहिये? गेल का इस विषय पर विचार अलग है। उनका कहना है कि सरकारी पैसे पर निर्भरता हो ही क्यों? अमरीका के विश्वविद्यालय खेलों के मर्केन्डाईज़ और टिकटों से कमा लेते हैं, खेलों से कमाई होती है तो इनके भरोसे गरीब परिवारों के बच्चे खेल वज़िफों पर विश्वविद्यालय में पढ़ लेते हैं। निजी फंडिंग से ही स्टेडियमों और खेल का साजो सामान का जुगाड़ होता है।
सानिया मैनिया के दौर में क्या कोई इस बात को सुनेगा?
टैगः देशभक्ति, कब्बडी, खेल, सानिया मिर्ज़ा
Monday, October 03, 2005
लताजी को नहीं पता जी?
जावेद अख़्तर ने सही कहा, लता जैसी न हुई न होगी। बिल्कुल सहमत हूँ। मुझे बुरा न लगेगा अगर आप उन्हें नोबल सम्मान दे दो, उनकी मूर्ति बना दो, मंदिर बना दो, १५१ एपिसोड का सीरियल बना दो चलो, पर सच तो स्वीकारो। मानव शरीर तो एक बायोलॉजीकल मशीन ठहरी, जब हर चीज़ की एकसपाईरी होती है तो क्या वोकल कॉर्ड्स की न होगी? मुझे लता जी के पुराने गीत बेहद पसंद है, उनके गाये बंगला गीत भी अद्वितीय है, पर "वीर ज़ारा" में उन को सुन कर लगा कि मदन मोहन भी अपनी कब्र में कराहते होंगे। बहुत राज किया है इन्होंने, लता आशा के साम्राज्य में सर उठाने को आमादा अनुराधा पौडवाल को गुलशन कुमार जैसे लोगों का दामन थामना पड़ा, और जब तक आवाज़ का लोहा माना तब तक बेटी गाने लायक उम्र में पहुँच गई। आज भी टेलेंट शो न जाने कितने ही माहिर लोगों को सामने लाते हैं पर सब "वन नंबर वंडर" बन कर गायब हो जाते हैं। श्रेया घोषाल जैसे इक्का दुक्का ही नाम पा सके।
मेरे विचार से यह ज़रूरी है कि निर्माता और संगीत निर्देशक इस बात को समझे और लता स्तुति छोड़ें, हर चीज़ का वक्त होता है, लता आशा अपने अच्छे वक्त को बहुत अच्छे से बिता चुकी हैं, वानप्रस्थ का समय है, उन्हें इस का ज्ञान नहीं हुआ पर आप तो होशमंद रहें।
टैगः व्यक्तिपूजन, लता मंगेशकर, मदन मोहन, वीर ज़ारा
Sunday, October 02, 2005
याहू की ब्लॉग सर्च?
गूगल चींटी
कौड़ियों से करोड़ों?
जो यह हजरत कह रहे है कुछ कुछ वैसा ही ख्याल मेरा भी है। पर पहले बात इस पेंटिंग, जिसका नाम यकीनन कुछ भी हो सकता था, "महिशासुर" की, यह तैयब मेहता साहब की पेंटिंग है। आपने सुना ही होगा कि यह तिकड़म १ नहीं २ नहीं ३ नहीं पूरे ७ करोड़ रुपये में किसी हज़रत ने खरीदी है। हम यह बहस नहीं करे तो अच्छा कि यह पैसा पसीने की कमाई है या नहीं या फिर खरीददार की मानसिक हालत कैसी है। अब सुनिये कथित जानकार लोग क्या कहते हैं इसके बारे में:
- तैयब ने मॉडर्न आर्ट की नई भाषा रची है। उनका रंगों का "सीधा और तीक्ष्ण" प्रयोग उनके युग के चित्रकारों के हिसाब से अनूठा है।
- तैयब का तरीका नायाब है, तिस पर महिशासुर का विषय जीवन और आशा की भावना जगाता है।
गौरतलब है कि तैयब कि पिछली एक पेंटिंग जो "काली" देवी पर बनी थी १ करोड़ में बिकी थी। मुझे नहीं मालूम कि ये बनाने और खरीदने वाले पागल है या नहीं पर जो बात साफ साफ समझ आती है वह यह कि पैसे का यह लेनदेन कोई सीधी सच्ची कहानी तो नहीं है। खरीदने की "एन.आर.आई शक्ति" सारे रिकार्ड तोड़ रही है, लोग अपना कलेक्शन बना कर शेखी बघारने के लिये कूछ भी कीमत दे रहे हैं कचरा कला के लिये। बिलाशक कंटेम्पररी आर्ट पर खामखां का हाईप बना रखा है मीडिया ने। ग्रामीण हस्तकला कलाकारों की कला की नकल करने वाले लोगों के वारे न्यारे हैं और असली कलाकार दो जून की रोटी के लिये तरस रहे हैं।
खैर, जब तक अंधेरा कायम है रोटी सेंकतें रहेंगे तैयब और उनकी बेशर्म जमात।
[उत्तरकथाः बड़ा अजब संयोग है, मैंने यह चिट्ठा १ अक्टूबर को लिखा पर प्रेषित नहीं कर पाया, आज देखता हूँ कि तैयब की यह कृति टाईम्स और एक्सप्रेस में भी चर्चा का सबब बनी है। लगता है मेरे विचार संप्रेषित भी हो रहे हैं ;) बहरहाल इससे मुझे जो बात पता चली वह यह है कि इन चित्रों के इतने हाईप्ड कीमत पर बिकने पर भी इनके बनाने वालों को कोई रॉयल्टी नहीं मिलती। अब शायद इस लेख का आखिरी वक्तव्य मुझे वापस ले लेना चाहिये!]
टैगः तैयब मेहता, महिशासुर, मॉडर्न आर्ट, कंटेम्पररी आर्ट
Friday, September 30, 2005
नया ब्लॉग वर्गीकरण
नासा और गूगल
Tuesday, September 27, 2005
पब्लिक सब जानती है
क्या गांगुली की कप्तानी २००५ के अंत तक टिकेगी? क्या राहुल गांधी २०१० में भारत के प्रधानमंत्री होंगे? ऐसे सवालों के जवाबों की उम्मीद तो अब तक तो हम बेजॉन दारूवाला जैसे लोगों से ही करते थे पर अब ये कयास वैज्ञानिक प्रयासों से काफी सच भी साबित हो सकते हैं। मेरे पसंदीदा चिट्ठाकारों में शामिल नितिन पई और श्रीजीत ने प्रेडिक्शन मार्केट के आर्थिक सिद्धांत पर एक नया प्रयोग किया है, पब्लिक ज्ञान के रूप में। प्रेडिक्शन मार्केट का सिद्धांत कहता है कि अगर ढेर सारे लोगों की व्यक्तिगत राय को सम्मिश्रित कर दिया जाय तो नतीजे वास्तविक नतीजों के काफी करीब होते हैं, जिसका ज़िक्र जेम्स सोरोविकी की कामयाब पुस्तक विस्डम आफ क्राउड में भी है।पब्लिक ज्ञान में आप अनुमान शेयर बाजार की तईं लगाते हैं फर्क बस इतना है कि खर्च कुछ नहीं करना पड़ता, सारा कारोबार रूपये या डॉलर में नहीं "मूलर" में होता है। मंच पर फिलहाल प्रवेश के लिये निमंत्रण की दरकार होगी। नितिन के इस अभिनव प्रयास के लिये ढेरों शुभकामनायें! स्मार्ट मॉब्स क्या कर सकती हैं यह इसका बेहतरीन उदाहरण बन कर उभरेगा।
टैग: प्रेडिक्शन, मार्केट, पब्लिक, ज्ञान, मूलर, नितिन, पई
आज तन्मय का जन्मदिन
आज यानि २८ सितंबर २००५ को मेरे पुत्र तन्मय का जन्मदिन है जो अब तीन वर्ष के हो चुके हैं। बेटा तो अभी हैं दादा दादी के पास तो मुझे भी मन मसोस कर फोन पर ही बधाई देनी पड़ेगी।बूबू हम सभी की ओर से तुम्हें हैप्पी बर्थडे और दीर्घ, सुखी और स्वस्थ जीवन के लिये आशीर्वाद और प्यार। तुम जीयो हज़ारों साल, साल के दिन हो पचास हज़ार!
Monday, September 26, 2005
बोले तो...
- सिक्स अपार्ट २००६ में छोड़ने जा रहा है नया शगूफा, प्रोजेक्ट कॉमेट, जो कहते हैं कि लाईव जर्नल, टाईप पैड और मूवेबल टाईप का सम्मिश्रण है। अब यह कॉमेट कैसा होगा यह तो वो ही जाने पर म्हारे को तो जै याहू ३६० डिग्रीज़ जैसी ही बात लगे है।
- फीड के दीवानों के लिये एक और नया आनलाईन फीडरीडर है फिंडोरी। ब्लॉगलाईंस का सफाया करने को उतारु यह हजरत न केवल कोई भी OPML सूची बल्कि ब्लॉगलाईंस के सब्सक्रिप्शन्स को भी इम्पोर्ट करने का माद्दा रखते हैं। कहा जा रहा कि यह बहुत "तेज़" है, यह बात है तो आज़मा कर देखना पड़ेगा!
- नाम कमाना है तो जर्मनी के देशवैले द्वारा आयोजित ब्लॉग अवार्ड में शुमार हों। बताना तो वैबी अवार्ड के बारे में भी चाहता हूँ पर यहाँ तो कुछ जीतने के लिये दमड़ी लगेगी। दूर से प्रणाम!
Sunday, September 11, 2005
अब तो छोड़ो मोह!
काहे के बड़े हैं,
अगर दही में पड़े हैं।
सत्ता को लालायित भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के बारे में यह काफी सटीक वचन हैं। सत्ता से विछोह के बाद से उपरी तौर पर सुगठित दिखने वाले संगठन की अंदरूनी दरारें तो खैर काफी दिनों से नज़र आ ही रही थीं। सुषमा स्वराज, प्रमोद महाजन, उमा भारती जैसे अनेकों टकटकी लगाये बैठे रहे हैं की पार्टी में उनका कुछ दबदबा कायम हो। राजनीति के पानी की सचाई यही है कि जो नेता मुखरित रूप से सतह पर नज़र आते हैं उनका वज़न वैज्ञानिक नियमों के तहत हल्का ही होता है। जिन्ना की तारीफ में कसीदे पढ़ने के बाद से ही आडवाणी का सिंहासन डोल उठा था, खुराना जैसे लोग इस फ़िराक में थे कि इसी तेज़ कैटरियानी बयार की ओट में अपना उल्लू सीधा हो जाय तो अच्छा। खुराना और उमा जैसे नेताओं का पार्टी में आधार ठीकठाक है पर समय समय पर पार्टी इनसे कर्त्तव्य पालन के नाम पर बलिदान भी मांगती रही है, उमा को मध्यप्रदेश का ताज़ सौंपना पड़ा गौर को तो खुराना भी हाशिये पर आने को मजबूर हुए। कल वाजपेयी और आडवाणी के मनमुटाव का फायदा ले कर बचने की सोच रहे खुराना के राजनैतिक करियर की ताबूत में आखिरकार अंतिम कील जड़ ही दी गई, हालांकि काँग्रेस शायद जल्द ही प्राणवायु पुनः फूंकने का प्रयास करे। खुराना के खुर कतरने के पीछे पार्टी का साफ संकेत यहः की पंगा ना लै मेरे नाल।
वाजपेयी के हालिया राजनैतिक चुप्पी से उपजते मोहभंग के शब्द से मेरा यह विचार बना था कि चलो शायद भाजपा इस बारे में राजनैतिक अपवाद बने और शीर्ष नेता ससम्मान पदत्याग कर नये लोगों को, खास तौर पर पुराने मोहरों को, आगे आने का मौका दें। पार्टी की सेहत की ज़मीन के लिये भी यह गुड़ाई अच्छी होती, नीचे की उपजाउ ज़मीन उपर आती और खरपतवार भी साफ होते। पर परिणाम में फिर वही ढाक के तीन पात! फिर वही पॉवर स्ट्रगल, वही पुरानी लड़ाई वर्चस्व की। अरे भैये, ८५-९० पार कर लिये आपने, जाने कब बुलावा आ जाय, जितनी इज़्जत और पैसा बनाना था सो तो बना ही लिया होगा, अब तो छोड़ो मोह। पद पर रह कर भी क्या रहे हो? क्या अगले चुनाव की ज़मीनी तैयारी है? क्या सहयोगी दल से अभी भी यारी है? इन दलों की छोड़ो, क्या संघ और शिव सेना अब भी मन के मीत हैं? क्या संगठन की मजबूती भीत है? हर रोज़ तो आप लोग बयान बदलते हो, दोनों शीर्ष नेताओं में ही नहीं पट रही। फिर काहे के बड़े हो? सचाई का सामना करो, उम्र का लिहाज़ करो, सचमुच बड़ा बने रहना है तो बड़ा निर्णय तो लेना ही होगा।
Thursday, September 08, 2005
मंगल पर दंगल
कहने को तो हम एक मुक्त समाज हैं, जहाँ हमें बोलने की मुकम्मल आज़ादी है पर यही आज़ादी बहस के नाम पर रोक टोक लगाने के भी काम आ जाती है। फिल्में तो ऐसे मामलों में ज्यादा प्रकाश में आती हैं। कभी आपत्ति फिल्म के टाईटल पर तो कभी एतराज़ कथानक या किरदार पर। आमिर खान की मंगल पांडे को पहले तो खराब प्रेस ज़्यादा मिली फिर फिल्म पिट भी गई। अव्वल तो ऐतिहासिक और पौराणिक पटकथाओं के कद्रदान ही कम होते हैं, तिस पर आज के ज़माने में चीज़ रीमिक्स न की हो तो जंचती नहीं। बहरहाल, आमिर मेहनती अभिनेता हैं, फिल्म के लिये स्वयं को "झोंक" देते हैं (वैसे जिस तरह से वह स्वयं को थोपते हैं, उस लिहाज़ से इस वाक्य में निर्देशक "जोंक देते हैं" जुमले का भी प्रयोग सही मानते), अपने होमवर्क और रीसर्च का गुणगान करते वे थकते नहीं थे। इस बीच बी.बी.सी के एक कर्मी मधुकर उपाध्याय ने १८६० में ब्रितानी सेना के एक सूबेदार सीता राम पाण्डेय की आत्मकथा का अवधी रूपांतर जारी किया है। कहना न होगा कि मौका भी था और दस्तूर भी। अब उपाध्याय का कहना है कि केतन मेहता और आमिर का फिल्म के कथानक की ऐतिहासिक सचाई का दावा बकवास है। कहा कि उन्होंने कोई शोध नहीँ किया, यहाँ तक कि दिल्ली स्थित राष्ट्रीय पुरालेखागार में तक नहीं गये जहाँ मंगल पांडे के कोर्ट मार्शल आर्डर की मूल प्रति संचित है। यानी कुल जमा यह लांक्षन लगा दिया कि फिल्म ऐतिहासिक रूप से सटीक नहीं हैं।किसी ऐतिहासिक या पौराणिक घटनाक्रम के नाट्य रूपांतरण में वाकई यह बड़ी दिक्कत है। निर्माता पर वाहवाही व ईनामात बटोरने और बॉक्स आफिस, सब का दबाव रहता है। ओथेंटिसिटी व ऍक्यूरेसी का दावा करना पड़ता है और आलोचक तुरंत जुट जाते हैं दावों में दोष निकालने पर। वैसे न मैंने यह फिल्म देखी है और न ही १८५७ के संग्राम की मेरी जानकारी स्कूली ज्ञान से ज्यादा है, पर मेरा विचार है कि निर्माताओं को अब परिपक्व हो कर ऐतिहासिक और पौराणिक घटनाओं में "फिक्शन" या काल्पनिक घटानक्रम का समावेश करने पर उसे स्वीकारने का साहस करना होगा। क्रियेटिव फ्रीडम के आधार पर मुझे यह स्वीकार्य होगा की ऐसी फिल्म बनें जिस में पटकथाकार यह कल्पना करे कि महात्मा गांधी आज जीवित होते तो क्या होता, या फिर कि महाभारत में अर्जुन किसी हालत में भी शस्त्र नहीँ उठाते तो कथानक की दिशा क्या होती। दिक्कत यही है कि निर्माता स्वयं भी परिभाषित नहीं करना चाहते असलियत और कल्पना के दायरे को। जहाँ पौराणिक घटनाओं से अक्सर धार्मिक संवेदनाएँ जुड़ी रहती हैं, तो ऐतिहासिक किरदारों के साथ समुदायों की प्रतिष्ठा और विश्वास का सवाल पैदा हो जाता है। हाँ, ऐतिहासिक घटनाओं के फिल्मीकरण में रिस्क अपेक्षाकृत कम होता है।
मेरे पसंदीदा निर्देशकों में से एक श्याम बेनेगल की एक फिल्म "कलयुग" में उन्होंने महाभारत को समकालीन सन्दर्भ में बयां किया था, एक फिक्शनल कथा का जामा पहनाकर। पूरी फिल्म में कहीं भी महाकाव्य का हवाला नहीँ दिया, निर्णय दर्शकों पर छोड़ दिया; पात्रों का पौराणिक टेम्पलेट पर चित्रण किया पर हूबहू फॉलो नहीं किया। यह दीगर बात है कि फिल्म उतनी चली नहीं, शायद सन्दर्भ दर्शकों के पल्ले नहीं पड़ा। और शायद इसी बात से फिल्म निर्माता डरते भी हैं। संदेश अगर परोक्ष रूप से, प्रतीकात्मक रूप से दिये जाय, कथानक अगर क्लिष्ट हो तो, फिल्म क्लासेस की बजाय प्रज्ञावान मॉसेस तक सिमट कर रह जाती है। मंगल पांडे फिल्म की कहानी १८५७ के स्वातंत्र्य संग्राम की पृष्ठभूमि में पांडे जैसे सैनिकों के क्रोध से समाज के भीतर बर्तानी हुकुमत और नीतियों के खिलाफ बढ़ते रोष का चित्रण संभव था, पर शायद यह फिर मॉसेस कि फिल्म न रहती, यह किसी कला फिल्म या एब्सट्रैक्ट चित्र जैसा हो जाता, जो चाहे सो मतलब निकाल ले। दूजा सच यह कि आज के ज़माने में हमें हर कथा में सुपरमैन नुमा किरदार चाहिये ही, यह सुपरमैन "डी" के पढ़े लिखे अंडरवर्ल्ड सरगना या "बंटी और बबली" के बंटी हो सकते हैं जो थ्रिल के लिये जुर्म करते है या फिर "सेहेर" का आदर्शवादी एसीपी जो कर्तव्य के लिये जान दे देता है, या फिर डबल्यू.डबल्यू.एफ हूंकार भरता बलवाकारी मंगल। तीजा ये कि, भैया टाईमिंग तो सही रखो, जब "भगत सिंह" टाईप फिल्मों का बाजार गरम था तब आपने ये बनानी शुरु की और फिर तीन चार साल तक बनाते ही रहे और यहाँ ज़माना वाया शाहिद करीना एम.एम.एस "नो एंट्री" तक आ पहुंचा, अब आप परोस रहे हो। हैं भई!वैसे निर्माताओं से ज्यादा दर्शकों पर निर्भर होता है कि दिशा क्या होगी। यहाँ "इकबाल" भी बनती है और "क्या कूल है हम" भी। तो उम्मीद यही की जाय कि प्रयोगधर्मी फिल्मकार ऐतिहासिक और पौराणिक विषयों को तौल कर लें, पर लें ज़रूर। सच्ची बनाओ या कोरी काल्पनिक, पर बनाओ दिल से। फिर नतीज़ा भले ही डेविड सेल्टज़र लिखित "ओमेन" जैसा बाईबल का सरलीकृत बयान हो या फिर अशोक बैंकर के "रामायण" की तरह यप्पी और टेक्नो, पसंद ज़रूर की जायेगी। आखिरकार बाज़ार में पिज़्ज़ा और नान दोनों की खपत होती है।
Sunday, September 04, 2005
अब अबला कहाँ?
बहरहाल, अबला नारी का जो तमगा साहित्य में जड़ा जा चुका है वह शहरी क्षेत्र में किसी भी हालत में लागू नहीं हो सकता। यहां की नार गाड़ियाँ ही नहीं हर जगह "स्पीड" की ख्वाहिशमंद हैं। नौकरियों ने उन्हें जरूरी आत्मविश्वास भी दिया है। जो नौकरी न भी करती हों पर जिनके मम्मी पापा ने उन्हें बहुत कुछ दिया है उनके पतियों को भी यह बात भूलने नहीं दी जाती। दरवाज़े पर नेमप्लेट से लेकर, मेडेन सरनेम रखने की जिद तक। "माई वाईफ्स मर्डर" में बोमन ईरानी के निभाये ईंस्पेक्टर के किरदार को उसकी पत्नी यह भूलने नहीं देती कि उसकी पदौन्नति "पापा" की कृपा है। आज लक्ष्मण का कार्टून (देखें चित्र) देखा तो फिल्म का यह अंश याद आ गया। तो भैया अगली दफा किसी शहरी अबला नारी के संतापों की कहानी देखने पढ़ने के पहले हम नमकदानी साथ ज़रूर रखेंगे।
Friday, September 02, 2005
Saturday, August 06, 2005
छा न पाई बदली
टैगिंग का जोर बढ़ता जा रहा है। इस बीच देसीपंडित पर देखा तो पता चला टैगक्लाउड यानी "टैगों की घटा" के बारे में। मज़ेदार चीज़ है, काफी कुछ टेक्नोराती टैग जैसी। अब जब हिंदी ब्लॉगमंडल में ८० से ज्यादा चिट्ठों का जमघट हो गया है तो टैगक्लाउड से ब्लॉगमंडल में चलती बातचीत के लोकप्रिय विषय जानने के लिये यह बेहतरीन तरीका होता और मैं यह बदली चिट्ठाविश्व पर डालने की सोच रहा था, दुर्भाग्य से यह अंग्रेज़ी शब्द ही बटोरकर दिखाता रहा। टैगक्लाउड वालों को लिखा कोई जवाब न आया, फिर पता लगा कि हजरत याहू की टर्म एक्सट्रैक्शन प्रणाली की मदद लेते हैं। आनन फानन एक जुगाड़ बनाया और तफ्तीश की तो पता लगा कि परेशानी की जड़ यही है, यह अंग्रेज़ी के अलावा कोई और भाषा पर ध्यान नहीं देता। इस टेस्ट पृष्ठ पर हिन्दी के वाक्यांश दे कर देखें तो पता लगेगा।
वैसे याहू की REST पर आधारित यह मुफ्त सेवा सीधी और सरल है। एक्टिवेशन कुंजी पट मिल जाती है और गति तो कमाल की है, वाक्यांश चाहे जितने भारी भरकम हो, जवाबी क्षमल तुरंत हाज़िर। इस सेवा को लोग अलग अलग तरीके से इस्तेमाल कर रहे हैं, कुछ लोग सख्त ख़फा भी हैं, टैगक्लाउड वाले टर्म यानि पद की श्रेष्ठता के आधार पर घटा बनाता है तो साईमन ने इसे आटोमैटिक टैग बनाने के अस्त्र के रूप में ढाल लिया। मैंने अपने अंग्रेज़ी चिट्ठे पर टैगक्लाउड डाल भी दिया। आप भी कुछ सोचिये!
Wednesday, July 20, 2005
चांद पर चीज़
रश्क होता है गूगल के लोगों की खिलंदड़ी पर। गूगल मैप्स के कुछ लोगों का ताज़ा शगल है गूगल मैप्स पर आधारित गूगल मून। १९६९ की मानव के चंद्रमा पर पदार्पण के नासा के चित्रों पर आधारित जालस्थल। अब आप पूछेंगे कि शीर्षक में यह "चीज़" क्या बला है! ये तो आपको तभी पता चलेगा जब आप चित्र पर ज़ूम इन करेंगे।